By: Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश में महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने संवैधानिक आयोग लंबे समय से उपेक्षा का शिकार हैं। प्रदेश के 20 आयोगों में से कई का पुनर्गठन नहीं हुआ है, जबकि 30 से अधिक महत्वपूर्ण पद वर्षों से खाली पड़े हैं। नतीजतन हजारों शिकायतें लंबित हैं और पीड़ितों को न्याय के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ रहा है।
महिला आयोग: सबसे गंभीर संकट
राज्य महिला आयोग सरकारी उदासीनता का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। 2018 के बाद से यहां अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों के पद खाली हैं। 2020 में सत्ता परिवर्तन के बाद पूर्व नियुक्तियों को निरस्त कर दिया गया, जिसके बाद मामला कोर्ट पहुंचा और आयोग पूरी तरह ठप हो गया।
वर्तमान में आयोग का कार्यालय केवल शिकायतें स्वीकार करने तक सीमित है। यहां 30 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं, जबकि हर साल करीब 3,000 नई शिकायतें आ रही हैं। नियमित बेंच न होने से सुनवाई और निर्णय पूरी तरह बंद हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराधों में प्रदेश के शीर्ष स्थान पर होने के बावजूद यह संस्था निष्क्रिय है, जिससे पीड़ित महिलाओं को केवल रसीद और आश्वासन मिल रहा है।
अल्पसंख्यक आयोग: 2020 से पूरी तरह बंद
अल्पसंख्यक आयोग के सभी चार पद (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और दो सदस्य) 2020 से रिक्त हैं। मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन सहित विभिन्न समुदायों से जुड़े 1,000 से अधिक मामले वर्षों से लंबित हैं। आयोग में कोई सुनवाई नहीं हो रही और निर्णय तो दूर की बात है।
सूचना आयोग: अपीलों का बोझ
सूचना के अधिकार से जुड़े मामलों में 25 हजार से ज्यादा अपीलें लंबित हैं। मुख्य सूचना आयुक्त के अलावा 10 आयुक्तों का प्रावधान है, लेकिन सात पद खाली हैं। केवल चार लोगों पर काम का भारी दबाव है, जिससे अपीलें तेजी से बढ़ रही हैं।
अन्य आयोगों की स्थिति
- मानवाधिकार आयोग: अध्यक्ष का पद लंबे समय से खाली। केवल एक कार्यवाहक सदस्य है, जबकि सुनवाई के लिए कम से कम दो सदस्य जरूरी हैं। आयोग केवल नोटिस जारी कर सकता है।
- एससी-एसटी आयोग: दोनों आयोगों में 2022 से अध्यक्ष और सदस्य पद रिक्त। करीब 900 शिकायतें लंबित। सचिव स्तर पर ही आवेदन जिलों को भेजे जा रहे हैं।
- उपभोक्ता, सफाई कर्मचारी, पिछड़ा वर्ग आयोग: या तो अध्यक्ष/सदस्य गायब हैं या स्टाफ और सचिव की कमी है।
- वित्त, कृषक और सामान्य गरीब कल्याण आयोग भी बिना अध्यक्ष और बेंच के चल रहे हैं।
विपक्ष की आलोचना
कांग्रेस ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि सभी आयोग जानबूझकर निष्क्रिय रखे गए हैं। केवल 30 नियुक्तियों से पूरा तंत्र खड़ा किया जा सकता है, लेकिन सरकार कोई कदम नहीं उठा रही। संवैधानिक संस्थाएं नाममात्र की रह गई हैं और पीड़ितों की कोई सुनवाई नहीं हो रही।
आयोगों में नियुक्तियों को लेकर शासन स्तर पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा है। कमजोर वर्गों के लिए बनी ये अंतिम उम्मीद की संस्थाएं आज खुद सिस्टम की अनदेखी का शिकार हैं।

