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Leftist Decline: वामपंथ का ढहता किला: बदलता राजनीतिक संतुलन
Leftist Decline: भाजपा का बढ़ता प्रभाव और सिमटता विपक्ष
By
Ravindra Singh Sikarwar
भारतीय राजनीति में बीते वर्षों के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने एक-एक कर कई बड़े राज्यों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। अब देश में केवल कुछ ही राज्य ऐसे बचे हैं जहाँ भाजपा सत्ता से दूर है। पश्चिम बंगाल और केरल ऐसे ही राज्य हैं, जिन्हें वामपंथ के पारंपरिक गढ़ के रूप में देखा जाता रहा है। अप्रैल 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा इन दोनों राज्यों में अपनी रणनीति को और धार दे रही है।
Leftist Decline: पश्चिम बंगाल: घुसपैठ और सियासी दबाव
पश्चिम बंगाल में सियासी माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है। बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे ने राज्य की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है, जिससे सत्तारूढ़ नेतृत्व पर दबाव बढ़ा है। मतदाता सूची संशोधन और सुरक्षा से जुड़े सवालों ने विपक्षी दलों की चिंता बढ़ा दी है। भाजपा इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसंख्या संतुलन से जोड़कर जनसमर्थन जुटाने का प्रयास कर रही है, जिससे सत्ताधारी दल असहज स्थिति में दिखाई दे रहा है।
Leftist Decline: केरल: परंपरागत द्विध्रुवीय राजनीति में दरार
केरल की राजनीति लंबे समय से यूडीएफ और एलडीएफ के बीच सत्ता के अदला-बदली के सिद्धांत पर टिकी रही है। हालांकि हालिया स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ की वापसी ने राजनीतिक समीकरणों को फिर से सक्रिय कर दिया है। इसके साथ ही भाजपा नेतृत्व वाला एनडीए भी अब केरल की राजनीति में एक गंभीर दावेदार के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। यह उभरता हुआ तीसरा विकल्प वामपंथ के लिए नई चुनौती बन गया है।
तिरुवनंतपुरम में बदले समीकरण
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में एनडीए की चुनावी सफलता ने राजनीतिक संकेतों को और स्पष्ट कर दिया है। पिछले कई दशकों से जिस क्षेत्र में वामपंथ का वर्चस्व रहा, वहीं अब भाजपा ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। यह केवल एक सीट की जीत नहीं, बल्कि राज्य में बदलते जनमत और भाजपा के बढ़ते जनाधार का प्रतीक है। इससे वामपंथी दल को सबसे बड़ा झटका लगा है।
वामपंथ के सामने अस्तित्व का संकट
त्रिपुरा में सत्ता गंवाने और पश्चिम बंगाल में हाशिये पर जाने के बाद केरल को वामपंथ का अंतिम मजबूत गढ़ माना जाता था। लेकिन अब यहाँ भी राजनीतिक जमीन खिसकती दिख रही है। भाजपा की कल्याणकारी योजनाओं, संगठनात्मक विस्तार और निरंतर प्रयासों का असर राज्य में दिखने लगा है। भले ही भाजपा के लिए 2026 में सत्ता तक पहुँचना चुनौतीपूर्ण हो, लेकिन इतना स्पष्ट है कि वह अब केवल दर्शक नहीं रही। केरल की राजनीति में तीसरी शक्ति के रूप में उसका उभार वामपंथ के लिए गंभीर चेतावनी है और आने वाले समय में राजनीतिक संघर्ष को और तीव्र कर सकता है।
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