EditorialEditorial
Spread the love

Editorial : कल्पना कीजिए—एक सुबह आपका स्मार्टफोन नेटवर्क तो दिखाए, लेकिन स्क्रीन पर संदेश उभरे: “Service Terminated”. Gmail न खुले, YouTube बंद हो, Google Maps दिशाहीन हो जाए, Microsoft Office की फाइलें लॉक हो जाएं, और Windows या Android ऑपरेटिंग सिस्टम ठप पड़ जाएं। जिस डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर देश का दफ्तर, शिक्षा, व्यापार और शासन टिका है, वह एक झटके में थम जाए।

यह कोई काल्पनिक भय नहीं, बल्कि एक कड़वी वास्तविकता की ओर इशारा करता असुविधाजनक प्रश्न है।

हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक समीकरण जिस तेज़ी से बदले हैं, उसने यह साबित कर दिया है कि व्यापारिक तनाव और प्रतिबंध किसी भी देश की डिजिटल रीढ़ को प्रभावित कर सकते हैं। भले ही भारत और अमेरिका के संबंध मजबूत हैं और अमेरिकी टेक दिग्गजों के लिए भारत एक विशाल बाज़ार है, लेकिन रणनीतिक तैयारी संभावनाओं पर नहीं, बल्कि ‘व Worst-Case Scenario’ (बदतर स्थितियों) पर बनती है।

Editorial आत्मनिर्भरता का विरोधाभास

पिछले एक दशक में भारत ने डिजिटल भुगतान (UPI) और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) में क्रांति ला दी है। लेकिन कड़वा सच यह है कि मूलभूत तकनीकों के मामले में हमारी निर्भरता आज भी शत-प्रतिशत विदेशी तंत्र पर है।

  • हमने मोबाइल असेंबल किए, लेकिन ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं बनाया।
  • हमने डिजिटल कंटेंट की बाढ़ ला दी, लेकिन YouTube या Google Search जैसा वैश्विक प्लेटफॉर्म खड़ा नहीं किया।
  • हमने आईटी सेवाएं दीं, लेकिन Cloud Infrastructure (AWS, Azure) या Office Software का स्वदेशी विकल्प तैयार नहीं किया।

विडंबना देखिए—Google, Microsoft, Adobe और NVIDIA जैसी दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियों का नेतृत्व भारतीय मूल के दिमाग कर रहे हैं। फिर भी, ‘ब्रांड इंडिया’ के पास अपना वैश्विक टेक साम्राज्य क्यों नहीं है?

Editorial ‘सेवा अर्थव्यवस्था’ से ‘उत्पाद अर्थव्यवस्था’ की चुनौती

समस्या प्रतिभा की नहीं, बल्कि तंत्र (Ecosystem) और सोच की है।

हमारी शिक्षा प्रणाली और सामाजिक ढांचा ऐतिहासिक रूप से “सुरक्षित नौकरी” और “दूसरों के लिए कोड लिखने” वाले इंजीनियर तैयार करने पर केंद्रित रहा है, न कि वैश्विक स्तर के उत्पाद (Products) बनाने वाले उद्यमियों पर। हम एक सफल ‘Service Economy’ तो बन गए, लेकिन ‘Product Economy’ बनने की दौड़ में पीछे छूट गए।

नवाचार (Innovation) केवल नारों या रातों-रात ऐप की नकल (Clone) बना देने से नहीं आता। इसके लिए गहरे अनुसंधान (Deep-Tech R&D), धैर्यवान पूंजी और जोखिम लेने की संस्कृति की आवश्यकता होती है।

आगे का रास्ता: ‘Invented in India’

डिजिटल आत्मनिर्भरता का अर्थ यह कतई नहीं है कि विदेशी कंपनियों के दरवाजे बंद कर दिए जाएं। आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ यह है कि यदि कल वे सेवाएं बंद भी हो जाएं, तो राष्ट्र की गति नहीं रुकनी चाहिए।

हम सोशल मीडिया पर गर्व से खुद को विश्वशक्ति कहते हैं—लेकिन वह पोस्ट भी हम विदेश प्लेटफॉर्म पर ही करते हैं। इस विरोधाभास को खत्म करने का समय आ गया है।

अब भारत को केवल “Made in India” तक सीमित न रहकर “Invented in India”, “Owned in India” और “Trusted Worldwide” की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। क्योंकि इतिहास गवाही देता है—दूसरों की तकनीक खरीदकर समृद्ध तो हुआ जा सकता है, लेकिन ‘तकनीकी महाशक्ति’ केवल अपनी तकनीक के दम पर ही बना जाता है।

ये भी पढ़े: ‘कैच द रेन 2026’ अभियान: ग्वालियर में सेनापति हनुमान मंदिर बावड़ी पर हुआ जन संवाद, जल संरक्षण का लिया संकल्प