By: Ravindra Sikarwar
भोपाल का प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र भारत भवन 9 से 11 जनवरी 2026 तक तीन दिवसीय भोपाल लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल (बीएलएफ) की मेजबानी कर रहा है। लेकिन इस आयोजन का एक सत्र, जिसमें बाबर के भारत आगमन को ‘हिंदुस्तान की खोज’ के रूप में चर्चा की जाएगी, विवाद का केंद्र बन गया है।
विवाद की मुख्य वजह: बाबर पर चर्चा
फेस्टिवल के कार्यक्रम में एक सत्र शामिल है जिसमें लेखक आभास मल्दहियार की पुस्तक Babur, The Quest for Hindustan पर बातचीत होगी। आलोचकों का कहना है कि बाबर को भारत की ‘खोज’ करने वाले के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी है, खासकर जब बाबर को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के ध्वंस से जोड़ा जाता है। यह सत्र राज्य सरकार के अधीन आने वाले सांस्कृतिक केंद्र में हो रहा है, जिसे कई लोग भारतीय संस्कृति के विपरीत मान रहे हैं।
नियमों की अनदेखी का आरोप
भारत भवन एक सरकारी न्यास द्वारा संचालित होता है और इसके संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि गैर-सरकारी संस्थाओं या निजी आयोजनों के लिए जगह नहीं दी जा सकती। फिर भी, बीएलएफ को लगातार यहां आयोजित करने की अनुमति मिल रही है। न्यास के कुछ सदस्यों ने शिकायत की है कि उन्हें इस आयोजन की जानकारी तक नहीं दी गई और न ही उनकी सहमति ली गई। पूर्व न्यासी सदस्यों का कहना है कि निजी कार्यक्रमों के लिए शुल्क निर्धारित करने की चर्चा तो हुई, लेकिन फैसला नहीं लिया गया।
सरकारी सहयोग और प्रायोजन
आयोजन में मध्य प्रदेश सरकार का लोगो आधिकारिक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा मध्य प्रदेश टूरिज्म, साहित्य अकादमी, जनजातीय मंत्रालय, इंडियन ऑयल, एनटीपीसी, एसबीआई जैसे सार्वजनिक और निजी संस्थान प्रायोजक हैं। आमंत्रण पत्र में पूर्व आईएएस अधिकारी राघव चंद्रा के साथ एसीएस (संस्कृति एवं गृह) शिव शेखर शुक्ल का नाम भी शामिल है, जो सरकारी समर्थन का संकेत देता है।
पिछले विवादों की याद
बीएलएफ पहले भी विवादों में रहा है। कुछ वर्ष पहले यहां LGBTQ+ विषय पर एक पुस्तक चर्चा हुई थी, जिस पर तत्कालीन मंत्री ने कड़ी आपत्ति जताई थी और मामला मुख्यमंत्री स्तर तक पहुंचा था। आलोचक अब सवाल उठा रहे हैं कि कार्यक्रमों की सामग्री की पूर्व समीक्षा का कोई तंत्र नहीं है, जिससे भविष्य में और विवादित विषयों पर चर्चा हो सकती है।
राष्ट्रीय नीति से विरोधाभास?
केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा दे रही है और इतिहास में आक्रमणकारियों के वर्णन को सीमित करने की दिशा में काम कर रही है। ऐसे में राज्य के सांस्कृतिक केंद्र में बाबर पर नए दृष्टिकोण की चर्चा को कई लोग विरोधाभासी मान रहे हैं।
संस्कृति मंत्री से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा गया, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। यह आयोजन साहित्य और कला के उत्सव के रूप में शुरू हो रहा है, लेकिन विवादों ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया है।
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