रिपोर्टर: खुशबू रावत
Sonipat : हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम से मानवीय संवेदनाओं और बिखरते पारिवारिक मूल्यों को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। अपनी तीनों बेटियों से मिलने की आस दिल में संजोए 74 वर्षीय पूर्व कपड़ा व्यापारी शिवचरण रतन गुप्ता ने दुनिया को अलविदा कह दिया। दुखद पहलू यह रहा कि पिता के अंतिम संस्कार तो दूर, अंतिम दर्शन के लिए भी तीनों बेटियों में से कोई नहीं पहुंची। बेटियों ने यूपीआई से 5,100 रुपये भेजकर संस्था से ही अंतिम संस्कार करने और उसकी वीडियो भेजने की बात कही।
Sonipat महाराष्ट्र के सफल व्यापारी थे शिवचरण, बेटियों को बनाया काबिल
मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले शिवचरण रतन गुप्ता अपने जमाने में एक बड़े कपड़ा व्यापारी थे। कोई बेटा न होने के कारण उन्होंने अपनी तीनों बेटियों—अनीता, निशा और प्रिया को पढ़ा-लिखाकर सक्षम बनाया, जिनमें से दो बेटियां शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। पत्नी मीना गुप्ता के निधन के बाद वे करीब डेढ़ वर्ष पूर्व सोनीपत के वृद्धाश्रम में रहने आए थे। वृद्ध आश्रम के संचालक आनंद के अनुसार, शिवचरण हमेशा अपने मोबाइल से बेटियों का इंतजार करते थे, लेकिन बीमारी के दिनों में बेटियों का हाल-चाल लेना भी बंद हो गया था।
Sonipat ऑनलाइन भेजा फंड और कहा- ‘वीडियो कॉल पर दिखा देना अंतिम संस्कार’
वृद्धाश्रम प्रबंधन ने बताया कि 20 दिन पहले जब शिवचरण की तबीयत बिगड़ी, तब भी बेटियों को सूचना दी गई थी, लेकिन वे कोई न कोई बहाना बनाती रहीं। देर रात निधन के बाद जब आश्रम ने शव को सुरक्षित रखने का प्रस्ताव दिया, तो भी नेपाल, आजमगढ़ और मुंबई में रह रही बेटियों ने आने में असमर्थता जताई। बड़ी बेटी ने ऑनलाइन 5,100 रुपये ट्रांसफर कर आश्रम प्रबंधन को ही सही तरीके से दाह-संस्कार करने को कहा। बेटियों ने न केवल अंतिम संस्कार बल्कि अस्थि विसर्जन में भी आने से इनकार कर दिया और वीडियो कॉल के जरिए ही रस्में देखीं।
इंसानियत ने संभाला फर्ज, समाज के लिए कड़ा संदेश
जब अपनों ने मुंह मोड़ लिया, तब वृद्धाश्रम के संचालकों और समाजसेवियों ने इंसानियत का फर्ज निभाते हुए दिवंगत शिवचरण गुप्ता का हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार संपन्न कराया। इस घटना ने व्यावसायिक दौर में घटते नैतिक मूल्यों और बुजुर्गों के प्रति बढ़ती उदासीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संस्था के सदस्यों ने कहा कि बच्चों को केवल शिक्षित और सफल बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि उनमें मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक संस्कारों का बीजारोपण करना भी उतना ही आवश्यक है।
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