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रिपोर्टर: गरिमा सोनी

New Delhi : प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA), 2026 को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल रही भ्रांतियों और वैश्विक चिंताओं पर भारत सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा के माध्यम से सरकार ने वैश्विक समुदाय को स्पष्ट किया कि यह कानून किसी धर्म, समुदाय या विचारधारा के खिलाफ नहीं है। भारत ने यह भी रेखांकित किया कि विदेशी फंड के विनियमन का ऐसा कानून बनाने वाला भारत अकेला देश नहीं है, बल्कि अमेरिका (FARA), ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन में भी ऐसे कड़े प्रावधान पहले से लागू हैं।

New Delhi भ्रांति बनाम सच्चाई: क्या सिविल सोसायटी की फंडिंग होगी बंद?

आलोचकों का दावा है कि नया कानून सिविल सोसायटी और NGO की विदेशी फंडिंग को रोकने के लिए लाया जा रहा है। सरकार ने इस भ्रांति को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिहाज से विदेशी फंड का नियमन लोकतांत्रिक देशों का संप्रभु अधिकार है। भारत में FCRA कानून 1976 से अस्तित्व में है। पंजीकृत संगठनों को मिलने वाला विदेशी योगदान 2010-11 के 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 2.67 अरब डॉलर हो चुका है। देश के 30 लाख से अधिक NGO में से केवल 14,450 ही FCRA के तहत आते हैं, और नियम पालन करने वाले किसी संगठन का कामकाज इससे बाधित नहीं होता।

New Delhi संपत्ति जब्ती का डर और पूजा स्थलों के लिए विशेष प्रावधान

इस दावे में भी कोई सच्चाई नहीं है कि कानून के तहत चैरिटी, स्कूल, अस्पताल या पूजा स्थलों की संपत्तियां मनमाने ढंग से जब्त कर ली जाएंगी। सरकार के अनुसार, FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द या सरेंडर होने पर संपत्ति का राज्य प्राधिकरण में निहित होना 2010 से ही लागू है। 2026 का नया विधेयक इन संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक नामित प्राधिकरण का गठन करता है और पंजीकरण बहाल होने पर संपत्ति वापसी का मार्ग भी देता है। इसके अलावा, यदि किसी रद्द संगठन ने पूजा स्थल बनाया है, तो उसे उसी धर्म के अन्य FCRA पंजीकृत संगठन को सौंपने का प्रावधान है ताकि धार्मिक गतिविधियां अनवरत चलती रहें।

निष्पक्ष नियमन: किसी विशिष्ट समुदाय या धर्म को निशाना नहीं

सरकार ने साफ किया है कि FCRA अधिनियम धर्म, समुदाय या विचारधारा के भेदभाव के बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है। हर समुदाय के संगठन कानूनी प्रक्रिया, पंजीकरण और पारदर्शिता के साथ धार्मिक शिक्षा, धर्मार्थ कार्य और शोध के लिए विदेशी फंड प्राप्त करने हेतु पूरी तरह स्वतंत्र और पात्र बने रहेंगे।

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