Bangladesh–India relationsBangladesh–India relations
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रिपोर्टर: प्रेम श्रीवास्‍तव

Bangladesh–India relations : भारत और बांग्लादेश के संबंध मात्र दो पड़ोसी देशों के कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं हैं। यह इतिहास, भूगोल, सुरक्षा और व्यापार के गहरे ताने-बाने से जुड़े हैं, जिनका सीधा प्रभाव भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दशक में दोनों देशों के रिश्तों ने जो मजबूती हासिल की थी, अगस्त 2024 के राजनीतिक घटनाक्रम और तख्तापलट के बाद वे एक नए और संवेदनशील मोड़ पर आ खड़े हुए हैं।

Bangladesh–India relations ऐतिहासिक आधार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं का नया विस्तार

भारत-बांग्लादेश संबंधों का आधार 1971 के मुक्ति संग्राम में पड़ा था। ऐतिहासिक रूप से सीमा विवाद और अवैध प्रवास जैसी जटिल समस्याएं बनी रहीं, लेकिन 2015 का ऐतिहासिक भूमि सीमा समझौता दोनों देशों के बीच विश्वास निर्माण का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ। इसके बाद के वर्षों में पूर्वोत्तर भारत को बांग्लादेश से जोड़ने वाली कनेक्टिविटी परियोजनाओं ने गति पकड़ी। अखौरा-अगरतला क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसने कोलकाता और अगरतला के बीच यात्रा के समय व दूरी को काफी हद तक कम कर दिया। इस कनेक्टिविटी ने पूर्वोत्तर की ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ पर निर्भरता घटाने और आर्थिक अवसरों को बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

Bangladesh–India relations सुरक्षा साझेदार के रूप में भूमिका और आर्थिक सहयोग का दायरा

पूर्वोत्तर भारत की आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता को बनाए रखने में ढाका के पूर्व सहयोग का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उग्रवादी समूहों पर की गई कार्रवाई ने क्षेत्र में शांति स्थापित करने में मदद की। इसके साथ ही, भारत ने बांग्लादेश में बुनियादी ढांचे के विकास, बिजली और ऊर्जा क्षेत्रों के लिए अरबों डॉलर की रियायती लाइन ऑफ क्रेडिट उपलब्ध कराई। इन पहलों ने सुरक्षा और अर्थशास्त्र को आपस में जोड़कर दोनों देशों को एक-दूसरे की आवश्यकता बना दिया।

बदले राजनीतिक हालात और संस्थागत साझेदारी की आवश्यकता

अगस्त 2024 के बाद बांग्लादेश के सत्ता परिवर्तन और उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों ने नई दिल्ली के समक्ष रणनीतिक सवाल खड़े किए हैं। शेख हसीना के भारत में रहने से जुड़ा मुद्दा कूटनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है। इसके अतिरिक्त, ढाका में नई सरकारों के आगमन के साथ बाहरी शक्तियों का बढ़ता प्रभाव भी भारत के लिए ध्यान योग्य विषय है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को व्यक्ति-केंद्रित कूटनीति से आगे बढ़कर दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत संस्थागत आधार देना होगा, ताकि राजनीतिक बदलावों का असर व्यापार, कनेक्टिविटी और पूर्वोत्तर की सुरक्षा पर न पड़े।

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