Pawan Kheda : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा को गुवाहाटी हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका को नामंजूर कर दिया है, जो असम के मुख्यमंत्री की पत्नी से जुड़े ‘पासपोर्ट विवाद’ के मामले में दायर की गई थी। इस फैसले के बाद अब असम पुलिस द्वारा उनकी गिरफ्तारी की संभावना प्रबल हो गई है।
Pawan Kheda क्या है पूरा मामला?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां शर्मा पर गंभीर आरोप लगाए। खेड़ा ने दावा किया था कि रिंकी भुइयां के पास तीन देशों (भारत, यूएई और एंटीगुआ-बारबुडा) के पासपोर्ट हैं और उन्होंने दुबई व अमेरिका में बेहिसाब संपत्तियां अर्जित की हैं।
इन आरोपों को “मनगढ़ंत और फर्जी” बताते हुए रिंकी भुइयां शर्मा ने गुवाहाटी के क्राइम ब्रांच पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई। पुलिस ने इस मामले में जालसाजी, धोखाधड़ी और मानहानि जैसी गंभीर धाराओं (BNS के तहत) में केस दर्ज किया है।
Pawan Kheda हाईकोर्ट में हुई तीखी बहस
न्यायमूर्ति पार्थिव ज्योति सैकिया की एकल पीठ ने इस मामले पर लंबी सुनवाई की।
- खेड़ा के वकील की दलील: वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह पूरा मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि खेड़ा के देश छोड़कर भागने का कोई खतरा नहीं है और यह मामला केवल मानहानि का बनता है, जिसमें गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है।
- सरकार का विरोध: असम के महाधिवक्ता देवजीत लोन सैकिया ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह केवल मानहानि का साधारण मामला नहीं है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि इसमें दस्तावेजों की हेराफेरी और जालसाजी शामिल है, जो एक गंभीर अपराध है।
Pawan Kheda कानूनी घटनाक्रम: तेलंगाना से गुवाहाटी तक
इस मामले में कानूनी दांव-पेच पिछले कई दिनों से जारी थे:
- तेलंगाना हाईकोर्ट: 10 अप्रैल को तेलंगाना हाईकोर्ट ने खेड़ा को 7 दिन की ‘ट्रांजिट अग्रिम जमानत’ दी थी।
- सुप्रीम कोर्ट: असम पुलिस की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी और खेड़ा को असम की संबंधित अदालत में जाने का निर्देश दिया।
- गुवाहाटी हाईकोर्ट: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद खेड़ा ने गुवाहाटी का रुख किया, जहाँ अब उनकी याचिका खारिज हो गई है।
Pawan Kheda आगे क्या?
अदालत से राहत न मिलने के बाद अब पवन खेड़ा के पास सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती देने का विकल्प बचा है। हालांकि, अंतरिम सुरक्षा न होने के कारण असम पुलिस कभी भी उन्हें हिरासत में ले सकती है। इस मामले ने आगामी चुनावों से पहले असम की राजनीति में भारी उबाल पैदा कर दिया है।
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