रिपोर्टर: सन्तोष सरावगी
Dabra : ग्वालियर जिले के डबरा और भितरवार ब्लॉक में मध्याह्न भोजन (MDM) योजना के तहत बर्तनों की खरीदी में एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए स्व-सहायता समूहों ने जिला पंचायत और एमडीएम प्रबंधकों के साथ मिलकर एक ऐसा जाल बुना, जिसमें बिना सामान खरीदे ही लाखों रुपये डकार लिए गए। इस भ्रष्टाचार में अधिकारियों की ‘कमीशनखोरी’ और समूहों की ‘फर्जी बिलिंग’ का गठजोड़ साफ नजर आ रहा है।

Dabra डबरा और भितरवार के समूहों ने लगाए फर्जी बिल
जांच में सामने आया है कि डबरा और भितरवार ब्लॉक के दर्जनों स्व-सहायता समूहों को खाना बनाने और बच्चों के खाने के बर्तन खरीदने के लिए फंड जारी किया गया था। जिन स्कूलों में छात्र संख्या 1 से 50 के बीच है, वहां नियमतः 10,000 से 15,000 रुपये दिए गए थे। आरोप है कि समूहों ने कूटरचित और फर्जी बिलों के माध्यम से राशि का आहरण कर लिया, जबकि हकीकत में स्कूलों को एक भी नया बर्तन नसीब नहीं हुआ।
Dabra अधिकारियों की मिलीभगत: शून्य छात्र संख्या पर भी मेहरबानी
भ्रष्टाचार की हद तो तब हो गई जब उन स्कूलों के समूहों को भी भुगतान कर दिया गया जहाँ छात्र संख्या शून्य है या जो स्कूल लंबे समय से बंद पड़े हैं। ग्वालियर स्थित एमडीएम प्रबंधक और जिला पंचायत स्तर के अधिकारियों ने बिना किसी भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के फाइलों को हरी झंडी दे दी। सूत्र बताते हैं कि प्रत्येक समूह से भुगतान के बदले एक निश्चित हिस्सा (कमीशन) कथित तौर पर ग्वालियर कार्यालय में बैठे जिम्मेदारों तक पहुँचाया गया है।
Dabra जाँच के घेरे में ग्वालियर एमडीएम प्रबंधन
इस घोटाले के उजागर होने के बाद अब उंगलियां सीधे तौर पर ग्वालियर के एमडीएम प्रबंधन पर उठ रही हैं। ग्रामीणों का सवाल है कि जब बच्चों की उपस्थिति और स्कूल की स्थिति का डेटा ऑनलाइन उपलब्ध है, तो बंद पड़े स्कूलों में बर्तन खरीदी का पैसा कैसे जारी हो गया?
- बड़ा सवाल: क्या ब्लॉक स्तर के अधिकारियों ने जानबूझकर गलत जानकारी भेजी?
- असर: इस घोटाले के कारण पात्र बच्चों को स्वच्छ और सुरक्षित बर्तनों में भोजन मिलने का अधिकार छिन गया है।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मामले की उच्चस्तरीय जांच और दोषी अधिकारियों व समूहों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग की है।
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