रिपोर्टर: अतुल भास्कर
New Delhi : दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजधानी के व्यस्त और मध्य क्षेत्र में होने वाले विरोध प्रदर्शनों को लेकर कड़ी और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखना दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी है, इसलिए जंतर-मंतर पर प्रस्तावित किसी भी प्रदर्शन की अनुमति देने या न देने का अंतिम फैसला पुलिस ही करेगी। याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि उनकी व्यक्तिगत राय में मुख्य शहर के बीचों-बीच प्रदर्शन की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि इससे आम नागरिकों की आवाजाही प्रभावित होती है और शहर बंधक बन जाता है।
New Delhi दलित ईसाइयों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति पर सुनवाई
यह मामला ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी (AIDCRPC) द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें 10 अगस्त को जंतर-मंतर पर सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक 75 लोगों के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति मांगी गई थी। संगठन की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट से केवल यह आग्रह किया था कि दिल्ली पुलिस उनके आवेदन पर जल्द निर्णय ले।
New Delhi स्वतंत्रता दिवस और सुरक्षा के मद्देनजर बीएनएसएस धारा 163 लागू
केन्द्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने कोर्ट में तर्क दिया कि आयोजकों ने स्थानीय अधिकारियों से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त नहीं किया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आगामी स्वतंत्रता दिवस को देखते हुए सुरक्षा कारणों से दिल्ली में बीएनएसएस की धारा 163 लागू है। इसके अलावा, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल बनाए रखने का मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
पिछली हिंसा और जनजीवन प्रभावित होने का दिया हवाला
अदालत को अवगत कराया गया कि बीते महीने जंतर-मंतर पर एक राजनीतिक दल के प्रदर्शन के दौरान भीषण हिंसा और पथराव हुआ था, जिसके बाद पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा था। उस घटना के चलते कनॉट प्लेस के बाजार जल्द बंद करने पड़े थे और मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद होने से आम जनता को भारी असुविधा हुई थी। एएसजी ने कहा कि 75 लोगों की अनुमति मांगकर भीड़ बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने निर्देशों के साथ याचिका का निपटारा करते हुए पुलिस को शनिवार तक अपना निर्णय स्पष्ट करने को कहा है।
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