By: Ravindra Sikarwar
MP news: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए एक सरकारी अधिकारी की याचिका खारिज कर दी। अधिकारी पर जाली दस्तावेजों के जरिए धोखाधड़ी का आरोप है। कोर्ट ने विभागों की सुस्ती और निष्क्रियता को विभागीय कार्रवाई में देरी का मुख्य कारण बताया, लेकिन इस आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी।
मामले का विवरण
पशुपालन विभाग के सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी ने याचिका दायर कर विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई रोकने की मांग की थी। उन पर 2019 और 2024 में जारी दो चार्जशीट में खुद और अपनी पत्नी के लिए फर्जी मेडिकल बिल जमा कर चिकित्सा प्रतिपूर्ति हासिल करने का आरोप लगा है। अधिकारी ने कार्रवाई में हुई देरी को आधार बनाकर चार्जशीट रद्द करने की गुहार लगाई।
जस्टिस अशीष श्रोति की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि इस मामले में न केवल सार्वजनिक धन दांव पर लगा है, बल्कि आरोपी कर्मचारी की ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की भी जांच जरूरी है। कोर्ट ने सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सरकारी विभागों में कार्रवाई में देरी होना आम बात है। इसका कारण ज्यादातर जिम्मेदार अधिकारियों की सुस्त रवैया और निष्क्रियता होता है। कई बार आरोपी कर्मचारी का प्रभाव भी इसमें भूमिका निभाता है। हालांकि, कोर्ट ने माना कि ऐसी देरी के बावजूद गंभीर मामलों में जांच पूरी करना आवश्यक है, खासकर जब धोखाधड़ी से सार्वजनिक धन की हानि हुई हो।
निर्णय का प्रभाव
इस फैसले से सरकारी विभागों में अनुशासनात्मक प्रक्रियाओं की गति पर सवाल उठे हैं। कोर्ट ने विभागों को अधिक सतर्क और सक्रिय रहने का संदेश दिया है। मामले में आगे की कार्रवाई विभागीय स्तर पर जारी रहेगी, और आरोपी को अब जांच का सामना करना होगा।
यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
