रिपोर्टर: प्रेम श्रीवास्तव
Sir Dorabji Tata : महानता अक्सर शांत रहकर राष्ट्र निर्माण की नींव मजबूत करने में निहित होती है। सर दोराबजी टाटा इसी दूरदर्शी और निःस्वार्थ भावना के अद्वितीय प्रतीक थे। उन्होंने बीहड़ जंगलों को विशाल इस्पात संयंत्रों में बदलकर औद्योगिक भारत का सपना साकार किया। अपने पिता जमशेदजी नसरवानजी टाटा के अधूरे सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी को उन्होंने एक महान अवसर में तब्दील किया।
सीमित संसाधनों, दुर्गम परिस्थितियों और औपनिवेशिक शासन की चुनौतियों के बावजूद उन्होंने साकची में भारत के पहले एकीकृत इस्पात कारखाने की नींव रखी, जिसे बाद में ‘जमशेदपुर’ नाम दिया गया। संकट के दौर में कंपनी को बचाने के लिए उन्होंने और उनकी पत्नी लेडी मेहरबाई ने अपनी निजी संपत्ति और प्रसिद्ध जुबली डायमंड तक गिरवी रख दिया था।
भारतीय ओलंपिक आंदोलन के जनक और खेलों के संरक्षक
Sir Dorabji Tata केवल उद्योगपति नहीं थे, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत की सशक्त उपस्थिति के सबसे बड़े पैरोकार थे। 1920 के एंटवर्प ओलंपिक में भारतीय दल को अपनी व्यक्तिगत पूंजी से भेजने का ऐतिहासिक निर्णय उन्हीं का था। उनके इन अभूतपूर्व प्रयासों के कारण 1927 में भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) का गठन हुआ और वे इसके पहले अध्यक्ष बने। आज उनकी इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए टाटा स्टील फुटबॉल (TFA), तीरंदाजी और हॉकी जैसी 5 विश्वस्तरीय खेल अकादमियां चला रही है। टाटा आर्चरी अकादमी ने देश को 8 ओलंपियन दिए हैं, जबकि नवल टाटा हॉकी अकादमी जमीनी स्तर पर दर्जनों प्रशिक्षण केंद्र संचालित कर रही है।
उद्योग, ऊर्जा और अनुसंधान के नए आयाम
Sir Dorabji Tata इस्पात निर्माण से आगे बढ़कर सर दोराबजी ने राष्ट्र की ऊर्जा और वैज्ञानिक जरूरतों को भी समझा। पश्चिमी घाट में जलविद्युत परियोजनाओं की शुरुआत करके उन्होंने ‘टाटा पावर’ की मजबूत बुनियाद रखी। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु की प्रगति में उन्होंने वित्तीय व रणनीतिक योगदान दिया, जिससे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान का मार्ग प्रशस्त हुआ।
संस्थानों का निर्माण और अमर सामाजिक विरासत
Sir Dorabji Tata 1932 में अपने निधन से पूर्व उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति ‘सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट’ को समर्पित कर दी। इसी ट्रस्ट के सहयोग से आगे चलकर टाटा मेमोरियल अस्पताल, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) और NCPA जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अस्तित्व में आए। उन्होंने अपने पीछे न केवल एक औद्योगिक साम्राज्य छोड़ा, बल्कि एक आत्मनिर्भर भारत की वह मजबूत नींव रखी जो आज भी देश की प्रगति को नई दिशा दे रही है।

