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Kozhikode : वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री के.पी. उन्नीकृष्णन का सोमवार सुबह कोझिकोड के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से आयु संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर से केरल सहित पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई।

केरल के मुख्यमंत्री Pinarayi Vijayan समेत कई प्रमुख नेताओं ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया और उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों का सशक्त प्रहरी बताया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उनके जाने से एक ऐसे दौर का अंत हुआ है, जिसने संसद में वैचारिक बहस और लोकतांत्रिक परंपराओं को नई दिशा दी।

समाजवादी सोच और संसदीय परंपराओं के मजबूत पक्षधर

Kozhikode के.पी. उन्नीकृष्णन को भारतीय संसद के उन नेताओं में शुमार किया जाता था, जो सदन को केवल राजनीतिक शक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि वैचारिक विमर्श का मंच मानते थे। अपनी प्रभावशाली वाणी और स्पष्ट विचारों के कारण वे सभी दलों के बीच सम्मानित थे।

आपातकाल के दौर में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए खुलकर आवाज उठाई। उनके भाषणों में समाजवादी विचारधारा की स्पष्ट झलक मिलती थी। राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के समय वे केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे और विभिन्न नीतिगत निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सार्वजनिक जीवन में उनकी सादगी और वैचारिक प्रतिबद्धता ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई।

वडाकारा से गहरा जुड़ाव और लगातार जनसमर्थन

Kozhikode उन्नीकृष्णन का राजनीतिक आधार केरल का वडाकारा लोकसभा क्षेत्र रहा। 1971 में पहली बार सांसद बनने के बाद उन्होंने कई चुनावों में लगातार जीत दर्ज की। 1977, 1980, 1984, 1989 और 1991 के आम चुनावों में भी जनता ने उन पर भरोसा जताया।

उनका अपने क्षेत्र के लोगों से गहरा संबंध था। वे अक्सर जनसुनवाई और क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय रहते थे। यही कारण था कि उनकी लोकप्रियता दलगत सीमाओं से परे मानी जाती थी। उनके कार्यकाल में क्षेत्र के विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रयास हुए, जिन्हें आज भी याद किया जाता है।

सोशलिस्ट पृष्ठभूमि से कांग्रेस तक का सफर

Kozhikode के.पी. उन्नीकृष्णन ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1960 के दशक में सोशलिस्ट पार्टी के साथ की थी। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हुए और 1962 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

वे उस पीढ़ी के नेताओं में से थे जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद के भारत में वैचारिक बहसों और राजनीतिक बदलावों को करीब से देखा और उनमें सक्रिय भूमिका निभाई।

उनके निधन से केरल की राजनीति ने एक अनुभवी और सिद्धांतनिष्ठ नेता को खो दिया है। सार्वजनिक जीवन में उनकी सादगी, वैचारिक स्पष्टता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को हमेशा याद किया जाएगा।

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