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रिपोर्टर: गनेश सिंह

Earthquake Early Warning System Uttarakhand : दुनिया के तमाम विकसित देशों की तरह भारत के पास भी अभी तक भूकंप की सटीक समय और स्थान के साथ भविष्यवाणी करने वाली कोई वैज्ञानिक तकनीक उपलब्ध नहीं है। हालांकि, भारत ने इस दिशा में एक बड़ी तकनीकी कामयाबी हासिल की है। हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए एक ऐसा आधुनिक भूकंपीय निगरानी नेटवर्क और क्षेत्रीय ‘भूकंप पूर्व चेतावनी तंत्र’ (EEW) विकसित किया गया है, जो भूकंप के शुरू होते ही विनाशकारी झटके जमीन तक पहुँचने से कुछ कीमती सेकंड पहले लोगों को अलर्ट कर सकता है।

Earthquake Early Warning System Uttarakhand पी-वेव्स (P-Waves) तकनीक पर आधारित है यह ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’

यह अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली भौतिकी और सीस्मोलॉजी के एक सरल सिद्धांत पर काम करती है। जब भी धरती के भीतर कोई भूकंपीय हलचल होती है, तो वहाँ से दो तरह की तरंगें निकलती हैं:

  • प्राथमिक तरंगें (P-Waves): ये तरंगें सबसे तेज गति से यात्रा करती हैं और इनसे कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है।
  • द्वितीयक तरंगें (S-Waves): ये विनाशकारी तरंगें होती हैं जो पी-वेव्स के पीछे आती हैं और तबाही मचाती हैं।

यह ईईडब्ल्यू (EEW) सिस्टम भूकंप के केंद्र (Epicenter) के पास ही इन शुरुआती पी-वेव्स को भांप लेता है। इसके तुरंत बाद, घातक तरंगों के रिहायशी इलाकों तक पहुँचने से पहले ही डिजिटल माध्यमों से अलर्ट जारी कर दिया जाता है, जिससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने या सायरन बजाने के लिए कुछ बेहद जरूरी सेकंड मिल जाते हैं।

Earthquake Early Warning System Uttarakhand आईआईटी रुड़की का ‘भूदेव’ ऐप: संकट के समय बनेगा जीवन रक्षक

इस अर्ली वार्निंग सिस्टम को आम जनता तक पहुँचाने का सबसे सफल प्रयास आईआईटी रुड़की (IIT Roorkee) ने उत्तराखंड सरकार के साथ मिलकर किया है। दोनों ने संयुक्त रूप से ‘भूदेव’ नामक एक अत्याधुनिक मोबाइल एप्लिकेशन विकसित किया है। यह ऐप रियल-टाइम डेटा का उपयोग करके स्थानीय लोगों को भूकंप की त्वरित चेतावनी देता है। संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय सीस्मोलॉजी केंद्र (NCS) पूरे हिमालयी क्षेत्र में इस प्रोटोटाइप एल्गोरिदम का परीक्षण और विस्तार कर रहा है, ताकि तीव्रता का तेजी से अनुमान लगाया जा सके।

Earthquake Early Warning System Uttarakhand एक्टिव फॉल्ट जोन में सेंसर नेटवर्क और चेतावनी की सीमाएं

भारत सरकार ने इस पूरे नेटवर्क को बेहद रणनीतिक रूप से स्थापित किया है:

  • सेंसरों की तैनाती: ये सीस्मिक सेंसर मुख्य रूप से उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं जैसे अत्यधिक संवेदनशील और ‘सक्रिय फॉल्ट जोन’ के करीब लगाए गए हैं।
  • दूरी का गणित: इस प्रणाली से मिलने वाला चेतावनी का समय इस बात पर निर्भर करता है कि आप भूकंप के केंद्र से कितनी दूर हैं। यदि कोई शहर उपरिकेंद्र (Epicenter) के बेहद करीब है, तो उसे प्रतिक्रिया के लिए बहुत कम समय मिलेगा। वहीं, केंद्र से दूर स्थित शहरों को बचाव के लिए अतिरिक्त समय मिल सकेगा।

वैश्विक संदर्भ: वर्तमान में भारत के अलावा जापान, ताइवान और अमेरिका जैसे देशों के पास दुनिया की सबसे उन्नत और सफल भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणालियां मौजूद हैं।

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