रिपोर्टर: रविन्द्र सिंह
Delhi : भारत में विलुप्त हो चुके चीतों को पुनर्स्थापित करने के लिए शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट चीता’ ने सफलतापूर्वक चार साल पूरे कर लिए हैं। 17 सितंबर 2022 को कूनो राष्ट्रीय उद्यान से शुरू हुई यह ऐतिहासिक योजना अब अपने अगले चरण में पहुंच गई है। कूनो के साथ-साथ अब मंदसौर के गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य तक चीतों का आवास फैल चुका है। आने वाले समय में मध्य प्रदेश के नौरादेही और गुजरात के बन्नी घास के मैदानों को भी इस परियोजना से जोड़ा जा रहा है। लक्ष्य यह है कि अगले छह वर्षों में लगभग 17,000 वर्ग किलोमीटर के विशाल परिदृश्य में 60 से 70 चीतों की एक सशक्त मेटापॉपुलेशन (सक्षम आबादी) तैयार की जा सके।

52 हुई देश में कुल संख्या, दक्षिण अफ्रीका से आएंगे 12 और मेहमान
Delhi वर्तमान में देश में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 52 हो गई है, जिनमें से 49 कूनो और 3 गांधी सागर में मौजूद हैं। सबसे खास बात यह है कि कुल आबादी में से 32 चीतों का जन्म भारत की धरती पर ही हुआ है, जो इस परियोजना की सफलता को दर्शाता है।

कूनो में चीतों का घनत्व नियंत्रित करने और आनुवंशिक विविधता बनाए रखने के लिए इस वर्ष अक्टूबर से दिसंबर के बीच दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत लाने की तैयारी अंतिम चरण में है। इसके साथ ही गुजरात के बन्नी घास के मैदानों में 500 हेक्टेयर क्षेत्र में एक संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र विकसित किया जा रहा है, जहाँ चीतों को अनुकूलन के बाद खुले जंगल में छोड़ा जाएगा।
दो अलग देशों के चीतों में दिखी अनोखी दोस्ती
Delhi परियोजना के दौरान वैज्ञानिकों और वन्यजीव विशेषज्ञों को चीतों के व्यवहार में एक नया और सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। कूनो में भारत में जन्मे नर चीते ‘केएनजी 23’ और बोत्सवाना से आए ‘सीसीबी 4’ के बीच गहरा सामाजिक जुड़ाव विकसित हुआ है। आमतौर पर नर चीते या तो अकेले रहते हैं या केवल अपने सगे भाइयों के साथ मिलकर शिकार और इलाके की रक्षा के लिए गठबंधन (कोएलिशन) बनाते हैं। अफ्रीका से बाहर दो अलग-अलग देशों और अलग-अलग पृष्ठभूमि के असंबंधित नर चीतों के बीच ऐसा गठबंधन बनना वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए एक बड़ा और दुर्लभ शोध विषय बन गया है।
संघर्ष से स्थापना तक: 4 वर्षों का प्रेरणादायक सफर
Delhi प्रोजेक्ट चीता का चार साल का सफर कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरा है। पहले साल में जहाँ नए वातावरण के अनुसार स्वास्थ्य प्रबंधन की रणनीतियाँ बनाई गईं, वहीं दूसरे साल में भारत में जनमे शावकों के सुरक्षित पालन-पोषण पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 13 से अधिक शावक एक वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। तीसरे वर्ष में चीतों को खुले जंगलों में छोड़ा गया जहाँ उन्होंने अंतरराज्यीय क्षेत्रों में अपना प्राकृतिक दायरा बढ़ाया। अब चौथा वर्ष इस योजना के स्थायी विस्तार का प्रतीक बन चुका है, जहाँ कूनो, गांधी सागर, नौरादेही और बन्नी मिलकर एक विशाल चीता कॉरिडोर का रूप ले रहे हैं।

