रिपोर्टर: रविन्द्र सिंह
Bhopal : मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में एक विशेष व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में पूर्व जनसंपर्क संचालक लाजपत आहूजा उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मिलिंद दांडेकर ने की। इस अवसर पर संस्थान के कई प्राध्यापक, अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे। अपने संबोधन में आहूजा ने भाषा के संरक्षण, साहित्यिक पठन-पाठन और आधुनिक तकनीक के दौर में हिंदी के अस्तित्व को लेकर महत्वपूर्ण विचार साझा किए।
संविधान सभा की बहसों का अध्ययन और गैर-हिंदी भाषियों का योगदान
Bhopal लाजपत आहूजा ने कहा कि हिंदी के वास्तविक महत्व को समझने के लिए संविधान सभा में इसे लेकर हुई ऐतिहासिक चर्चाओं का अध्ययन करना आवश्यक है। उन्होंने अफसोस जताया कि स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी हिंदी को वह आधिकारिक स्थान नहीं मिल सका है जिसकी वह हकदार थी। उन्होंने रेखांकित किया कि हिंदी के प्रसार में सिर्फ हिंदी भाषियों का ही नहीं, बल्कि गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों का भी अमूल्य योगदान रहा है। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय सिनेमा की सराहना करते हुए कहा कि हिंदी फिल्मों ने इस भाषा को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।
दसवां विश्व हिंदी सम्मेलन और साहित्य संवर्धन की जरूरत
Bhopal अपने भाषण में उन्होंने भोपाल में आयोजित दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का जिक्र करते हुए पूर्व विदेश मंत्री दिवंगत सुषमा स्वराज के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि उस सम्मेलन में पारित कई महत्वपूर्ण संकल्पों को धरातल पर उतारना अभी बाकी है। आहूजा ने महान साहित्यकार जयशंकर प्रसाद के नाटकों का उदाहरण देते हुए इस बात पर बल दिया कि युवा पीढ़ी में हिंदी साहित्य के पठन-पाठन की संस्कृति को पुनर्जीवित करना बेहद जरूरी है, क्योंकि बिना साहित्य के कोई भी भाषा समृद्ध नहीं हो सकती।
भाषा और संवेदनाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं
Bhopal अनुवाद के क्षेत्र में बढ़ते तकनीक के इस्तेमाल पर चिंता व्यक्त करते हुए लाजपत आहूजा ने सलाह दी कि एआई (Artificial Intelligence) और गूगल जैसे टूल का उपयोग बेहद सतर्कता के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं का अभिव्यक्ति माध्यम है, जिसे पूरी तरह मशीनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदी का विकास अब तक स्वतःस्फूर्त रहा है, लेकिन अब इसके व्यवस्थित और योजनाबद्ध विकास के लिए सामूहिक प्रयासों की सख्त आवश्यकता है।

