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वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की कलम से

Editorial : मप्र के मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव मुझे नहीं जानते लेकिन मैं उन्हे जानता हूँ. वे मुझे जानें ये जरूरी नहीं किंतु मैं उन्हे जानूँ ये ज्यादा जरुरी है. चूंकि मैं मोहन यादव को जानता हूँ इसलिए उनको लेकर चिंतित भी रहता हूँ. इसी चिंता के चलते मैं मोहन बाबू का अहित होते नहीं देख सकता.

मोहन बाबू उडन-छू मुख्यमंत्री हैं. वे पिछले दो साल तीन महिने में कितने दिन हवाई जहाज और हैलीकाप्टर में रहे, कितने दिन /रात भोपाल में रहे? इस सबका हिसाब मैं पिछले दिनों दे चुका हूँ. मुख्यमंत्री के रूप में यादव जी की व्यस्तता अच्छी लगती है किंतु उनकी इस कथित व्यस्तता की वजह से जन प्रतिनिधियों के साथ आम जननता को जो परेशानी हो रही है उसका अंदाजा न मुख्यमंत्री को है न भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष को. सब उनकी ठकुरसुहाती में लगे हैं.

भोपाल में श्यामला हिल स्थिति मुख्यमंत्री आवास पर पडकुलियां उडती मिलती हैं, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं मिलते. दिसंबर 2023 और उससे पहले मुख्यमंत्री आवास पर मुख्यमंत्री भी मिलते थे और अफसर भी. मुख्यमंत्री आवास में आम जनता के लिए तंबू भी लगता था और मुख्यमंत्री खुद आगंतुकों से मिलकर उनकी दुख तकलीफ सुनने के साथ ही उनका निवारण भी करते थे.

आजकल मुख्यमंत्री आवास या मुख्यमंत्री सचिवालय में मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के दर्शन दुर्लभ हैं. मुख्यमंत्री के पास न भोपाल में टिकने का समय है और न सचिवालय में बैठने का समय. उनका सचिवालय उनके साथ- साथ हवा – हवाई है. चूंकि मुख्यमंत्री अनुपलब्ध हैं इसलिए मुख्यसचिव भी सचिवालय जाकर क्या करें? अब तो मंत्रिमंडल की बैठकें भी डेस्टिनेशन वाली होने लगीं हैं इसलिए सचिवालय बाबुओं के अधीन है. आप कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री का सचिवालय मुख्यमंत्री जी खुद नहीं कुछ चुनिंदा नौकरशाह और बाबू चला रहे हैं.

एक जमाना था जब कमलनाथ जैसे मुख्यमंत्री हवा में उडने के बजाय सचिवालय में ऐसे हाजरी बजाते थे जैसे वे वेतनभोगी नौकर हों. उस समय मुख्य सचिव से लेकर चपरासी तक देर रात तक सचिवालय में मौजूद रहते थे क्योंकि मुख्यमंत्री वहाँ डटे रहते थे. आज स्थिति उलट गई है. सचिवालय मुख्यमंत्री की चरण रज के लिए तरस रहा है. सचिवालय स्टाफ की चाय-पानी का खर्च तक नहीं निकल रहा. जब मुख्यमंत्री सचिवालय नहीं जा रहे तो मंत्री भी नदारद हैं और सचिव भी.

मुमकिन है कि मेरी बात को मुख्यमंत्री सचिवालय गलत और अतिश्योक्ति कह दें किंतु मैं आदतन झूठ नहीं बोलता इसलिए जो कह रहा हूँ, सच कह रहा हूँ. मैं खुद 45 साल पहले मुख्यमंत्री आवास पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह से तडके 6 बजे मिला हूँ. दिग्वजय सिंह से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक के मुख्यमंत्रित्व काल में श्यामला हिल स्थिति मुख्यमंत्री आवास रौनक- अफरोज रहता था, जो अब नहीं है.

मेरा कहना है कि अगर मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव को बेफिक्र होकर सरकार चलाना है तो वे हवाई जहाज और हैलीकाप्टर का मोह छोडें. अपने सरकारी आवास और सचिवालय को ज्यादा वक्त दें. जनता से सीधे मिलें. अपना समानांतर सूचना तंत्र विकसित करें तो कुरसी को लेकर उनकी चिंता/डर खुद ब खुद आधा हो जाएगा. अन्यथा कौन, कब उन्हे खो दे, दे वे जान भी नहीं सकेंगे.

आप शायद जानते हों या न जानते हों कितु ये सच है कि मुख्यमंत्री का किसी भी गांव, शहर का एक दौरा कम से कम 5 करोड रुपए का पडता है. मुख्यमंत्री कर्ज के बोझ से सिसक रहे प्रदेश को अपनी हवाई यात्राओं पर रोक लगाकर, अपने सरकारी आवास पर शिविर लगाकर, सचिवालय को ज्यादा वक्त देकर राहत प्रदान कर सकते हैंं. मुख्यमंत्री जितना ज्यादा समय भोपाल में अपने सचिवालय और आवास कार्यालय को देंगे उतनी कम साजिशें उनके विरूद्ध रची जा सकेंगी.

मै मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव का शुभचिंतक हूँ इसलिए बिना मांगे उन्हे मशवरा दे रसहा हूँ. मैं खुद पिछले 27 महिने में मुख्यमंत्री जी के मुख दर्शन के लिए तरस गया हूँ. आप सोच सकते सैं कि फिर आम आदमी की क्या दशा होगी?

हम पत्रकार तो फिर भी मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल के माध्यम से मुख्यमंत्री से मिल भी लें लेकिन उन गरीबों का क्या होगा जिनके पास कोई आशीष नहीं है. मेरी पुख्ता जानकारी है कि आम आदमी की तो छोडिए प्रदेश भाजपा के ही दर्जनों विधायक ऐसे हैं जो मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंच पाते. कहते हैं न -“यथा रजा, तथा मंत्री “. जब मुख्यमंत्री बंगले और सचिवालय नहीं जाते तो किसी मंत्री की क्या अटकी कि वो मंत्रालय में अपने कक्ष में जाकर बैठे? मैं यदि गलत लिख गया होऊं तो मुझे काला कौवा आकर काट ले, लेकिन मुझे पता है कि कोई काला कौवा मेरे पास फटकेगा तक नहीं, क्योंकि मैं सौ टंच सच लिख रहा हूँ.

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