Gangaur 2026 : राजस्थान समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में आज गणगौर का पावन पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। चैत्र नवरात्रि की तृतीया तिथि को मनाई जाने वाली ‘बड़ी गणगौर’ सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए भगवान शिव (ईसर जी) और माता पार्वती (गौरा जी) की विशेष पूजा-अर्चना करती हैं। कुमारी कन्याएं भी अच्छे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत श्रद्धापूर्वक रखती हैं।
गणगौर 2026: पूजा की तिथि और सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त
Gangaur 2026 इस वर्ष चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि का विस्तार 20 और 21 मार्च दोनों दिन हो रहा है, परंतु उदया तिथि की मान्यता के अनुसार मुख्य पर्व 21 मार्च 2026 को ही मनाया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, गणगौर की पूजा सुबह के समय करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
- तृतीया तिथि प्रारंभ: 20 मार्च 2026, रात्रि 02:30 बजे से।
- तृतीया तिथि समाप्त: 21 मार्च 2026, रात्रि 11:56 बजे तक।
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:49 से 05:36 तक (आत्मिक शांति और संकल्प के लिए सर्वोत्तम)।
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:04 से 12:52 तक (किसी भी मांगलिक कार्य के लिए श्रेष्ठ)।
पूजन सामग्री की पूर्ण सूची और ‘गुने’ का महत्व
Gangaur 2026 गणगौर की पूजा में शुद्धता और पारंपरिक सामग्रियों का विशेष स्थान है। पूजा शुरू करने से पहले इन वस्तुओं को एकत्रित कर लेना चाहिए:
- मुख्य सामग्री: लकड़ी की चौकी (पाटा), तांबे का कलश, ईसर-गौरा की मिट्टी या लकड़ी की प्रतिमा, आम के पत्ते, कलश के लिए नारियल और कलावा।
- श्रृंगार और अर्पण: कुमकुम, हल्दी, मेहंदी, सिंदूर, काजल, अबीर, गुलाल और अक्षत (चावल)। माता गौरा के लिए लाल चुनरी और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं।
- भोग और प्रसाद: शुद्ध घी का दीपक, अगरबत्ती, फूल, फल, पान के पत्ते और विशेष रूप से बनाए गए ‘गुने’।
‘गुने’ बनाने की परंपरा: गणगौर के प्रसाद में ‘गुने’ (आटे या बेसन के छोटे आभूषणनुमा पकवान) का विशेष महत्व है। लोक मान्यता है कि जितने अधिक गुने माता को अर्पित किए जाते हैं, घर में उतनी ही सुख-समृद्धि बढ़ती है। पूजा के पश्चात ये गुने सुहागिन महिलाओं में प्रसाद स्वरूप बांटे जाते हैं।
माता पार्वती की विशेष आराधना और धार्मिक महत्व
Gangaur 2026 गणगौर का पर्व शिव-शक्ति के अटूट प्रेम का प्रतीक है। तृतीया तिथि माता पार्वती को समर्पित है, इसलिए महिलाएं उन्हें सुहाग का प्रतीक मानकर हल्दी, मेहंदी और कुमकुम अर्पित करती हैं। दीवार पर सोलह बिंदिया (हल्दी, मेहंदी और कुमकुम की) लगाकर पारंपरिक लोक गीत गाए जाते हैं।
मान्यता है कि माता पार्वती ने भी इसी दिन कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था और बाद में अन्य महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया था। यही कारण है कि इस दिन सुहागिनें दोपहर के समय सामूहिक रूप से एकत्रित होकर गणगौर की कथा सुनती हैं और शाम को विसर्जन के साथ इस 18 दिवसीय उत्सव का समापन करती हैं।
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