By: Ravindra Sikarwar
बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले में एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक युवा हिंदू व्यक्ति, जो एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करता था, को कथित तौर पर ईश निंदा के आरोप में उग्र भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। इसके बाद भीड़ ने उसके शव को पेड़ से लटकाया और आग के हवाले कर दिया। यह घटना 18 दिसंबर 2025 की रात को भालुका इलाके में हुई, जहां पीड़ित की उम्र महज 25 से 27 वर्ष बताई जा रही है। पीड़ित का नाम दीपु चंद्र दास था, जो एक साधारण मजदूर था और अपनी जिंदगी रोजी-रोटी कमाने में गुजार रहा था।
यह घटना उस समय हुई जब बांग्लादेश में पहले से ही अशांति का माहौल व्याप्त था। एक प्रमुख छात्र नेता शरीफ ओसमान हादी की सिंगापुर में मौत के बाद देशभर में हिंसक प्रदर्शन हो रहे थे। हादी की हत्या के आरोपों ने लोगों में गुस्सा भड़का रखा था, और इसी अस्थिर वातावरण में यह दर्दनाक हादसा सामने आया। फैक्ट्री में विश्व अरबी भाषा दिवस मनाने के दौरान कथित रूप से दीपु चंद्र दास पर पैगंबर मुहम्मद के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप लगा। यह आरोप फैक्ट्री के अंदर से शुरू हुआ और तेजी से बाहर फैल गया, जिसके बाद सैकड़ों की संख्या में लोग इकट्ठा हो गए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भीड़ ने पहले दीपु को फैक्ट्री के बाहर घेर लिया और बुरी तरह पीटा। जब वह बेहोश हो गया या मर चुका था, तब उसके शव को ढाका-मयमनसिंह राजमार्ग के किनारे एक पेड़ पर उल्टा लटकाया गया। इसके बाद क्रूरता की हद पार करते हुए शव को आग लगा दी गई। पुलिस को सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। शव को बरामद कर मयमनसिंह मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मोर्चरी में पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया।
इस घटना की अंतरिम सरकार ने तुरंत निंदा की। मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा कि नए बांग्लादेश में ऐसी हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस जघन्य अपराध के दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। सरकार की ओर से जारी बयान में जोर दिया गया कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता है।
कार्रवाई में देरी न करते हुए रैपिड एक्शन बटालियन (आरएबी) ने विभिन्न जगहों पर छापेमारी की और सात संदिग्धों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार व्यक्तियों की उम्र 19 से 46 वर्ष के बीच है। इनके नाम हैं – मोहम्मद लिमोन सरकार (19), मोहम्मद तारेक हुसैन (19), मोहम्मद मानिक मिया (20), इरशाद अली (39), निजुम उद्दीन (20), आलमगीर हुसैन (38) और मोहम्मद मिराज हुसैन अकोन (46)। आरएबी-14 की टीम ने इन गिरफ्तारियों को अंजाम दिया, जो इस बात का संकेत है कि सरकार मामले को गंभीरता से ले रही है।
इस घटना ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर हिंदुओं की सुरक्षा पर फिर से सवाल उठाए हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से देश में अल्पसंख्यकों पर हमले की कई घटनाएं सामने आई हैं। बांग्लादेश हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन ओइक्य परिषद ने इस हत्या की कड़ी निंदा की और दोषियों को तुरंत सजा देने की मांग की। उन्होंने इसे सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाली करतूत बताया।
निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन ने भी इस घटना पर गहरा दुख जताया। उन्होंने दावा किया कि दीपु चंद्र दास को फैक्ट्री में एक मुस्लिम सहकर्मी ने झूठा आरोप लगाकर फंसाया। तसलीमा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह झूठी अफवाहों का नतीजा है, जो अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का हथियार बन रही हैं।
भारत में भी इस घटना ने चिंता की लहर दौड़ा दी है। पश्चिम बंगाल भाजपा ने इसे हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले का उदाहरण बताया और बांग्लादेश सरकार से सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की। कई मानवाधिकार संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले को उठाया है, मांग की है कि बांग्लादेश में सांप्रदायिक हिंसा पर अंकुश लगाया जाए।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि अफवाहें और उन्माद कितनी जल्दी जान ले सकते हैं। कानून का शासन मजबूत होना चाहिए, ताकि कोई भी व्यक्ति बिना जांच के सजा न पाए। उम्मीद है कि गिरफ्तारियां न्याय की दिशा में पहला कदम साबित होंगी और दीपु चंद्र दास की आत्मा को शांति मिलेगी। बांग्लादेश जैसे बहुसांस्कृतिक देश में शांति और सद्भाव बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।
