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By: Ravindra Sikarwar

बेंगलुरु, जो भारत की आईटी राजधानी के रूप में जाना जाता है, वहां साइबर अपराधों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हाल ही में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसमें एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर महिला साइबर ठगों के ‘डिजिटल अरेस्ट’ नामक धोखाधड़ी के शिकार हो गईं। ठगों ने उन्हें इतना डराया कि उन्होंने अपनी दो जमीनें, एक फ्लैट बेच दिया और बैंक से कर्ज लेकर कुल 2 करोड़ रुपये से अधिक की रकम गंवा दी। यह मामला न केवल व्यक्तिगत नुकसान की कहानी है, बल्कि यह बताता है कि कैसे आधुनिक तकनीक का दुरुपयोग करके अपराधी लोगों की जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं।

यह घटना जून महीने से शुरू हुई। पीड़ित महिला, जो अपने 10 साल के बेटे के साथ बेंगलुरु के विग्नान नगर इलाके में रहती हैं, को एक फोन कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को एक कुरियर कंपनी का अधिकारी बताया और दावा किया कि महिला के आधार कार्ड से जुड़ा एक पार्सल जब्त किया गया है, जिसमें संदिग्ध सामग्री मिली है। महिला हैरान रह गईं, क्योंकि उन्होंने कोई ऐसा पार्सल नहीं भेजा था। ठग ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह मामला गंभीर है और अब मुंबई पुलिस इसमें शामिल हो रही है।

कुछ ही देर बाद दूसरा कॉल आया, जिसमें कॉलर ने खुद को पुलिस अधिकारी बताया। उन्होंने महिला को धमकी दी कि उनके खिलाफ ड्रग्स तस्करी या मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोप हैं। जांच के नाम पर उन्हें घर से बाहर न निकलने की हिदायत दी गई और कहा गया कि वे ‘डिजिटल अरेस्ट’ में हैं। ठगों ने महिला को एक ऐप इंस्टॉल करने को कहा, ताकि वे उनकी निगरानी कर सकें। सबसे डरावनी बात यह थी कि ठगों को महिला के बेटे के बारे में जानकारी थी। उन्होंने धमकी दी कि अगर महिला ने सहयोग नहीं किया तो उनके बच्चे को भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा या उसकी जान को खतरा हो सकता है।

डर और दबाव में महिला ने ठगों की हर बात मान ली। ठग बार-बार पैसे की मांग करते रहे, कभी जांच शुल्क के नाम पर, कभी जुर्माना या सिक्योरिटी के बहाने। शुरू में महिला ने अपनी बचत से पैसे ट्रांसफर किए, लेकिन जब रकम बढ़ती गई तो उन्होंने मजबूरी में अपनी संपत्तियां बेचनी शुरू कर दीं। सबसे पहले मलूर क्षेत्र में स्थित दो प्लॉट्स को बहुत कम कीमत पर बेचा गया। फिर भी मांगें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं, तो विग्नान नगर वाले फ्लैट को भी औने-पौने दाम पर बेच दिया। जब ये सब खत्म हो गया, तब भी ठगों की भूख नहीं मिटी। महिला ने बैंक से लोन लेकर बाकी रकम जुटाई और ठगों के बताए खातों में ट्रांसफर कर दी।

यह सिलसिला जून से नवंबर तक चला। कुल मिलाकर महिला ने 22 बार में करीब 2.05 करोड़ रुपये ठगों को भेज दिए। आखिरकार ठगों ने कहा कि अब जांच पूरी हो गई है और पैसे वापस लेने के लिए नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर एनओसी लें। महिला पुलिस स्टेशन पहुंचीं, तो वहां सच का पता चला। पूरा मामला धोखाधड़ी था। ठगों ने फोन स्विच ऑफ कर दिए और गायब हो गए।

महिला ने व्हाइटफील्ड साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। वे ठगों के बैंक खातों को ट्रेस करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ऐसे मामलों में रकम वापस मिलना मुश्किल होता है। यह घटना कर्नाटक में साइबर क्राइम की बढ़ती समस्या को उजागर करती है। राज्य में पिछले तीन सालों में साइबर अपराधों से रोजाना औसतन 6 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो रहा है, जबकि रिकवरी बहुत कम है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम आजकल बहुत आम हो गया है। ठग पुलिस, सीबीआई या अन्य सरकारी एजेंसियों का नाम लेकर लोगों को डराते हैं। वे वीडियो कॉल पर फेक यूनिफॉर्म पहनकर या आधिकारिक दिखने वाले दस्तावेज दिखाकर विश्वास जीत लेते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि असली पुलिस या सरकारी अधिकारी कभी फोन पर पैसे मांगते नहीं हैं न ही घर से बाहर न निकलने की धमकी देते हैं। ऐसे कॉल आएं तो तुरंत स्थानीय पुलिस से संपर्क करें या 1930 हेल्पलाइन पर रिपोर्ट करें।

यह मामला हमें सतर्क रहने की याद दिलाता है। तकनीक जितनी उपयोगी है, उतनी ही खतरनाक भी अगर सावधानी न बरती जाए। पीड़ित महिला की जिंदगी अब पूरी तरह उजड़ चुकी है – घर बिक गया, कर्ज चढ़ गया और बचत खत्म। उम्मीद है पुलिस जल्द ठगों तक पहुंचेगी और ऐसे अपराधों पर लगाम लगेगी। समाज को भी जागरूक होने की जरूरत है, ताकि कोई और परिवार इस जाल में न फंसे।