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By: Ravindra Sikarwar

विवादित बयान देकर सुर्खियों में आए आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा की मुश्किलें तो बढ़ी ही हैं, अब उन वरिष्ठ अधिकारियों पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं, जिनकी भूमिका उन्हें आईएएस अवॉर्ड दिलाने में मानी जा रही है। प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में इस पूरे मामले को लेकर नई बहस छिड़ गई है। सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2019 में जब संतोष वर्मा को आईएएस अवॉर्ड देने के लिए विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक आयोजित हुई थी, उस समय उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रकरण की अहम जानकारी कथित तौर पर छिपाई गई थी।

बताया जा रहा है कि अवॉर्ड प्रक्रिया को निर्बाध बनाए रखने के लिए कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर ऐसे पुलिस और प्रशासनिक दस्तावेज तैयार कराए गए, जिनसे यह दर्शाया जा सके कि वर्मा के खिलाफ कोई गंभीर मामला लंबित नहीं है। जबकि वास्तविकता यह थी कि उनके खिलाफ आपराधिक केस दर्ज था। अब इसी बिंदु को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी कर वर्मा को अवॉर्ड दिया गया।

सूत्रों के मुताबिक, संतोष वर्मा को आईएएस अवॉर्ड दिलाने में तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस, उस समय की अपर मुख्य सचिव (सामान्य प्रशासन विभाग) दीप्ति गौड़ मुखर्जी और कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। यह सवाल इसलिए और गंभीर हो गया है क्योंकि जिस न्यायाधीश पर वर्मा के पक्ष में कथित फर्जी आदेश देने का आरोप था, उसके खिलाफ कार्रवाई पहले ही हो चुकी है। इसके बाद वर्मा पर भी फर्जीवाड़े का मामला दर्ज हुआ, उन्हें निलंबित किया गया और जेल भेजा गया।

प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि जब एक बार यह साबित हो चुका है कि फर्जी आदेश के आधार पर लाभ लिया गया, तो स्वाभाविक रूप से आईएएस अवॉर्ड को लेकर भी पुनर्विचार होना चाहिए। ऐसे में यह संभावना जताई जा रही है कि संतोष वर्मा से आईएएस अवॉर्ड वापस लिया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी अवॉर्ड प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो सकती है।

जानकारी के अनुसार, संतोष वर्मा को आईएएस अवॉर्ड दिलाने में करीब 21 आईएएस अधिकारियों के अलावा कुछ जनप्रतिनिधियों की भी भूमिका रही। या तो उनकी खुली सहमति थी या फिर मौन समर्थन, जिसके चलते न केवल अवॉर्ड दिलवाया गया, बल्कि निलंबन के बाद बहाली का रास्ता भी आसान बनाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने के बावजूद उसे अवॉर्ड देना संवैधानिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से विवादास्पद है।

पूरा घटनाक्रम 2019 से जुड़ा है, जब संतोष वर्मा का नाम आईएएस पदोन्नति के लिए प्रस्तावित किया गया था। उस समय उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण चल रहा था, इसके बावजूद डीपीसी में उनका नाम शामिल किया गया। उस बैठक में तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस समिति के अध्यक्ष थे। इसके बाद 8 अक्टूबर 2020 को वर्मा ने एक न्यायालय आदेश विभाग में प्रस्तुत किया, जिसमें उन्हें दोषमुक्त बताया गया था। बाद में यह आदेश फर्जी पाया गया।

इसके बाद अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, इंदौर से यह राय मांगी गई कि क्या इस मामले में अपील की जानी चाहिए। कथित तौर पर तत्कालीन लोक अभियोजक की राय का हवाला देते हुए अपील में जाने से इंकार कर दिया गया। यही नहीं, 12 दिसंबर को केंद्रीय कार्मिक विभाग को भेजे गए राज्य सरकार के पत्र में भी इस पूरे मामले की जांच का उल्लेख किया गया है। उस पत्र में यह सवाल भी उठाया गया है कि निचले स्तर के अधिकारी को लिखे गए पत्र का जवाब वरिष्ठ अधिकारी द्वारा क्यों दिया गया।

संतोष वर्मा पर यह भी आरोप है कि उन्होंने 2019 में आईएएस पदोन्नति के लिए आवेदन करते समय अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई। बाद में कथित फर्जी न्यायालय आदेश का उपयोग कर अवॉर्ड हासिल किया। इसके बाद उनके खिलाफ नया आपराधिक केस दर्ज हुआ, गिरफ्तारी हुई और निलंबन भी किया गया। वर्ष 2022 में वर्मा ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) में अपील की, जहां उन्हें आंशिक राहत मिली।

हाल ही में 23 नवंबर को अजावस कार्यक्रम के दौरान दिए गए विवादित बयान के बाद संतोष वर्मा का विरोध और तेज हो गया। यह विरोध विधानसभा से लेकर लोकसभा तक गूंजा। अब मध्य प्रदेश सरकार ने केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय को यह प्रस्ताव भेजा है कि वर्मा को सेवा से बर्खास्त किया जाए या नहीं। इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय केंद्र सरकार को लेना है। लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में यह प्रकरण केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर सकता है।