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By: Ravindra Sikarwar

भारत–चीन युद्ध के अनगिनत अध्यायों में एक ऐसा प्रसंग दफ्न है, जिसका उल्लेख इतिहास की किताबों में भले कम हो, लेकिन शौर्य गाथाओं में उसका स्थान सर्वोच्च है। वही अध्याय अब पर्दे पर “120 बहादुर” के रूप में आया है—एक ऐसी फ़िल्म, जो ‘बॉर्डर’ की धुन और ‘300’ के जज़्बे जितनी चमकदार नहीं, मगर अंत तक आते-आते दर्शक की आत्मा पर एक स्थायी छाप छोड़ जाती है। निर्देशक रजनीश घई यहाँ युद्ध की भव्यता नहीं, बल्कि बलिदान की पवित्रता को प्राथमिकता देते हैं। उनके हाथों में यह सिनेमेटिक कैनवास एक विजुअल पोएट्री बन जाता है—धीमी, सरल, मगर भीतर तक उतरने वाली। फ़िल्म की रीढ़ है मेजर शैतान सिंह भाटी की वीरगाथा, जिसे फरहान अख्तर शांत, संयत और दृढ़ स्वर में जीते हैं। यह वही कहानी है जिसकी वीरता वॉर कॉलेजों में पढ़ाई जाती है, लेकिन बड़े पर्दे पर अपनी पूर्णता में अब तक नहीं दिखाई दी थी।

रेज़ांग ला का रणक्षेत्र: जहाँ 120 जवानों ने पर्वतों में अग्नि जलाई
कहानी का कथात्मक ढाँचा दर्शक को 1962 की हाड़ कंपाने वाली सर्दी में खींच ले जाता है—लद्दाख़ के रेज़ांग ला में, जहाँ भारत की कुमाऊँ रेजिमेंट के 120 सैनिक तैनात थे। चीन की सेना हथियारों, संख्या और तकनीक में कई गुना आगे थी; उनके हजारों सैनिकों का लक्ष्य था दर्रे को पार कर जम्मू–कश्मीर पर कब्ज़ा जमाना। परंतु इस रास्ते में खड़े थे सिर्फ ‘120 बहादुर’—ऐसे जवान जो इस बात को जानते हुए भी कि सामने मौत खड़ी है, पीछे हटने को तैयार नहीं थे। फ़िल्म इस संकल्प को किसी अतिनाटकीय प्रभाव में नहीं दिखाती; बल्कि यथार्थवादी स्तब्धता के साथ उस पल को पकड़ती है जब आदेश आता है कि “संख्या कम है, पीछे हटो।”

मगर मेजर शैतान सिंह का जवाब वही था जो सदियों से वीरगाथाओं की ध्वनि है—

“यह हमारी धरती है। इसे पार करने के लिए उन्हें हमारे प्राणों से होकर गुजरना होगा।”

इस वाक्य के साथ फ़िल्म एक नए गति-पथ पर चल पड़ती है। आगे का युद्ध सिर्फ गोलियों का आदान–प्रदान नहीं, बल्कि ऐसी मुठभेड़ है जिसमें हर गोली, हर वार और हर अंतिम सांस का महत्व है। चीनी सेना की लाशें पहाड़ों पर ऐसे बिछती हैं जैसे किसी तूफान ने उन्हें गिरा दिया हो। दंतकथाओं की तरह बताया जाता है कि जब चीन के अफसर युद्ध के बाद वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने अपनी राइफलें नीचे कर ‘आर्म्स–डाउन’ सलाम किया—क्योंकि सामने पराक्रम था, और पराक्रम के सामने दुश्मन भी नतमस्तक होता है।

फ़िल्म की संवेदना: शैतान सिंह की ‘परम गति’ का काव्यात्मक चित्रण
फ़िल्म का सबसे प्रभावशाली भाग उसका अंतिम अनुक्रम है—एक लंबा युद्ध दृश्य, जो किसी सिनेमेटिक तमाशे से अधिक एक अनुष्ठान जैसा प्रतीत होता है। यहां निर्देशक कृत्रिमता से बचते हैं और शहीद होने की प्रक्रिया को किसी ‘गौरवपूर्ण मृत्यु’ नहीं, बल्कि ‘कर्तव्य के संपूर्ण निर्वहन’ के रूप में दिखाते हैं। मेजर शैतान सिंह का चरित्र न उग्र, न अतिनाटकीय—सिर्फ कर्तव्य के प्रति समर्पित एक साधक की तरह उभरता है।

जब चीनी सैनिकों की गोलियों से घायल होकर वे अंतिम क्षणों में एक चट्टान के सहारे बैठते हैं, तब फ़िल्म कविता बन जाती है। हवा का हल्का शोर, उड़ते बर्फ के कण और पूरी लड़ाई के बाद झुकता हुआ सूरज—ये सब मिलकर ऐसा दृश्य बनाते हैं जो शब्दों के बिना भी महाकाव्य की तरह महसूस होता है।

यही वह दृश्य है जिसके कारण दर्शक महसूस करता है कि ‘‘120 बहादुर’’ सिर्फ एक युद्ध फ़िल्म नहीं, बल्कि एक स्मारक है—उन जवानों के लिए जिनकी आखिरी सांस भी मातृभूमि के कण–कण के लिए समर्पित रही। यह दृश्य खत्म होने के बाद भी मन में गूँजता रहता है, शायद इसलिए कि मृत्यु यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक ‘परम गति’ है जिसे सैनिक अपनी इच्छा से चुनता है।

कहानी मजबूत, मगर सांस्कृतिक प्रस्तुति में चूकें भी
फिल्म की सबसे बड़ी आलोचना यही है कि मेजर शैतान सिंह की वास्तविक सांस्कृतिक पहचान—उनका मारवाड़ी लहजा, राजस्थानी पोशाकें और बनासर गाँव का स्वरूप—उचित रूप में चित्रित नहीं किए गए। कई बार हिंदी फ़िल्मों की आदत है कि किसी भी क्षेत्रीय पात्र को ‘सार्वभौमिक हिंदीकरण’ में ढाल दिया जाए, जिससे उसकी असलियत मिट जाती है। ‘‘120 बहादुर’’ भी इसी प्रवृत्ति का शिकार होती है।

फरहान अख्तर का किरदार लुक में तो शौर्यवान लगता है, लेकिन आवाज़, भाषा और पोशाक में राजस्थानी रंग गायब है। मेजर शैतान सिंह के पिता, जो स्वयं प्रथम विश्व युद्ध के वीर अधिकारी थे, उनका संदर्भ भी सतही रूप में आता है। पत्नी–माता की वेशभूषा तक प्रामाणिक नहीं लगती।

यह कमी दर्शक को बार–बार याद दिलाती है कि वास्तविकता से सिनेमा कितना दूर हो सकता है। युद्ध के दृश्यों में तो फ़िल्म चमकती है, लेकिन निजी जीवन के चित्रण में उसका शोध अधूरा लगता है। यही कारण है कि दर्शक शैतान सिंह के निजी व्यक्तित्व को पूरी तरह समझ नहीं पाता, जबकि उनका जीवन किसी भी चरित्र विशेषण से अधिक विशाल था।

फ़िल्म क्यों देखनी चाहिए?
“120 बहादुर” तकनीकी रूप से भले भव्य न लगे, परंतु इसकी आत्मा में एक ऐसा ताप है जो किसी भी भारतीय को झकझोर देता है। यह उन वीरों का परिचय है जिनकी कहानी स्कूलों की किताबों में भी मुश्किल से मिलती है। यह उन परिवारों के नाम एक श्रद्धांजलि है जिनके घरों ने अपने बेटों को समर्पित किया ताकि देश की सीमाएँ अक्षुण्ण रहें।

फ़िल्म उस एक सत्य पर टिकी है—कि युद्ध सिर्फ दो देशों के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि साहस और मूल्य–व्यवस्था की परीक्षा है। रेज़ांग ला के उन 120 जवानों ने यह परीक्षा इस तरह दी कि उनका शौर्य आने वाले हज़ार वर्षों तक याद रखा जाएगा।