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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) संबोधन के बाद उनके राजनीतिक करिश्मे यानी ‘मोजो’ और युवाओं के बीच उनकी पकड़ को लेकर राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ शो में इस बात पर मंथन किया गया कि क्या पिछले कुछ महीनों में युवाओं से बनी दूरी को पाटने में पीएम मोदी कामयाब रहे हैं और इसका उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।

12 साल के शासन के बाद युवाओं से दोबारा कनेक्ट साधने की रणनीति

कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने प्रधानमंत्री मोदी की हालिया SRCC स्पीच की तुलना उनके 2013 के उस चर्चित संबोधन से की, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। चर्चा में यह बात सामने आई कि 2013 और आज की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर है, क्योंकि तब वे केंद्र की सत्ता में नहीं थे, जबकि आज उनके 12 साल के कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने है। हाल के महीनों में युवाओं के बीच असंतोष और कनेक्ट में आई कमी की धारणा को तोड़ने के लिए ही पीएम मोदी ने सीधे संवाद का रास्ता चुना है। सोशल मीडिया वीडियो, युवाओं से अपील और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में कार्यक्रमों को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

असली परीक्षा उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में

विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे युवा-केंद्रित चुनाव भले ही कुछ संकेत दें, लेकिन बीजेपी के लिए असली अग्निपरीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी। चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद यूपी से सांसद हैं और देश की राजनीति में इस राज्य का विशेष महत्व है, इसलिए यहां मोदी की लोकप्रियता के साथ-साथ सीएम योगी आदित्यनाथ के प्रभाव की भी कड़ी परीक्षा होनी तय है। चर्चा में यह बात भी उठी कि भले ही पार्टी के प्रति पहले जैसा उत्साह कम हुआ हो, लेकिन सीएम योगी की व्यक्तिगत लोकप्रियता में कोई बड़ी गिरावट दर्ज नहीं की गई है।

संगठन की चुनौतियां और विपक्ष की नई रणनीतियाँ

लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण पार्टी के भीतर आए बदलावों, कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच बढ़ती दूरी तथा ‘सेंस ऑफ एंटाइटलमेंट’ जैसी आंतरिक चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। इसके साथ ही, विपक्ष की रणनीति पर बात करते हुए बताया गया कि राहुल गांधी जाति जनगणना, आरक्षण और रोजगार के मुद्दों के जरिए युवाओं और पिछड़ों को साधने में जुटे हैं। वहीं, अखिलेश यादव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामाजिक समीकरणों, जाट-गैर-जाट और मुस्लिम वोटों के जरिए अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

यूपी के बदलते सियासी समीकरण और योगी की स्थिति

चर्चा के अंत में यह निष्कर्ष सामने आया कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी से कुछ हद तक नाराजगी या उदासीनता जरूर दिख रही है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कोर वोटर पार्टी से पूरी तरह छिटक गया है। ब्राह्मण और राजपूत जैसे सवर्ण वोटों के समीकरण पर भी चर्चा हुई, जिसमें यह माना गया कि नाराजगी के बावजूद वे पूरी तरह बीजेपी से दूर नहीं जा रहे हैं। यहां तक कि कई मामलों में सरकार से नाराजगी का सीधा असर सीएम योगी पर नहीं पड़ता, बल्कि वे खुद बीजेपी के भीतर एक मजबूत विकल्प के रूप में देखे जाते हैं। SRCC जैसे कार्यक्रमों से मिला रिस्पॉन्स एक शुरुआत जरूर है, लेकिन इसका असली और अंतिम फैसला चुनावी मैदान के नतीजे ही तय करेंगे।