Gwalior : सिंधिया राजघराने के करीब 40,000 करोड़ रुपये की अकूत संपत्ति के बंटवारे का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। ग्वालियर जिला अदालत में चल रहे इस वर्षों पुराने कानूनी विवाद में 78 साल पुराना ऐतिहासिक दस्तावेज ‘द कोवेनेंट’ (विलय पत्र/अनुबंध) बेहद निर्णायक कड़ी साबित हो सकता है।
Gwalior स्वतंत्रता के बाद हुआ था ऐतिहासिक अनुबंध
13 अगस्त 1948 को भारत सरकार और तत्कालीन मध्य भारत रियासत के बीच ‘द कोवेनेंट’ नामक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस ऐतिहासिक दस्तावेज के जरिए ही राजा-रजवाड़ों की निजी संपत्तियों और सरकारी परिसंपत्तियों का अलग-अलग सीमांकन किया गया था। दिल्ली की नोटरी द्वारा प्रमाणित इस दस्तावेज में ग्वालियर के भव्य जय विलास पैलेस, सुसेरा कोठी, साख्या विलास, शिवपुरी के माधव विलास पैलेस, जॉर्ज कैसल, दिल्ली कोठी (राजपुर रोड) और पुणे के पद्मा विलास जैसी प्रमुख परिसंपत्तियों को सिंधिया राजघराने की व्यक्तिगत संपत्ति माना गया था।
प्रिवी पर्स और निजी संपत्तियों का पूरा ब्योरा
इस दस्तावेज में रियासतों के विलय के बदले राजाओं को मिलने वाले कर-मुक्त भत्ते (प्रिवी पर्स) का भी विस्तृत ब्योरा दर्ज है। तत्कालीन व्यवस्था के तहत महाराजा जे.एम. सिंधिया को 25 लाख रुपये, यशवंतराव होल्कर को 15 लाख रुपये, ए.आर. पवार को 2.9 लाख रुपये, देवास सीनियर को 1.45 लाख रुपये, देवास जूनियर को 1.8 लाख रुपये तथा मठवार रियासत को 6,000 रुपये का वार्षिक भत्ता तय किया गया था।
समझौते के बीच नई कानूनी उलझन, बुआ की बेटी ने दायर की कैविएट
अदालत में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, पूर्व मंत्री यशोधरा राजे और परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा आपसी सहमति से ‘फैमिली सेटलमेंट’ पेश करने की कोशिशों के बीच एक नया मोड़ आ गया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बड़ी बुआ (स्व. पद्माराजे सिंधिया) की पुत्री प्रतिमा देवी ने अदालत में कैविएट दाखिल कर दी है। नेपाल के राणा परिवार में ब्याही गईं प्रतिमा देवी का कहना है कि उनकी मां के कानूनी उत्तराधिकारी होने के नाते उनका पक्ष सुने बिना कोई भी अंतिम फैसला पारित न किया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होनी तय है।

