रिपोर्टर: अविनाश श्रीवास्तव
Sasaram : राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूत कभी मरते नहीं, वे अपनी शहादत से करोड़ों दिलों में अमर हो जाते हैं। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पिछले वर्ष हुए आतंकी हमले में शहीद हुए इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के जांबाज अधिकारी मनीष रंजन की पहली बरसी पर आज सासाराम का माहौल पूरी तरह गमगीन रहा। उनकी स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में न केवल परिजनों के आंसू छलक पड़े, बल्कि पूरा शहर अपनी माटी के लाल की बहादुरी को नमन करने के लिए उमड़ पड़ा।
Sasaram घर की चौखट पर यादों का सैलाब
सासाराम के गौरक्षणी स्थित शहीद मनीष रंजन के पैतृक आवास पर आज सुबह से ही सन्नाटा पसरा था, जिसे रह-रहकर परिजनों की सिसकियां तोड़ रही थीं। मनीष रंजन की पहली बरसी के अवसर पर उनके आवास पर एक विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। शहीद के तैल चित्र पर पुष्प अर्पित करते समय उनके चाचा आलोक कुमार और अन्य परिजनों का धैर्य जवाब दे गया। जिस लाडले को उन्होंने बड़े अरमानों से देश सेवा के लिए विदा किया था, उसकी तस्वीर के सामने खड़े होना पूरे परिवार के लिए एक हृदयविदारक क्षण था। स्थानीय लोगों ने भी इस दौरान बड़ी संख्या में पहुँचकर अपनी पुष्पांजलि अर्पित की और शहीद के प्रति सम्मान प्रकट किया।
Sasaram बचपन से ही था ‘वर्दी’ और ‘वतन’ से लगाव
श्रद्धांजलि सभा के दौरान शहीद के चाचा आलोक कुमार ने भरे गले से मनीष के बचपन के संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि मनीष बचपन से ही साधारण बच्चों से अलग थे; उनके खेल और बातों में हमेशा देश सेवा का जज्बा झलकता था। मनीष ने कठिन परिश्रम के बल पर इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसे महत्वपूर्ण विभाग में अपनी जगह बनाई थी। पिछले वर्ष पहलगाम में ड्यूटी के दौरान आतंकियों से लोहा लेते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की थी। परिजनों ने गर्व के साथ कहा कि “मनीष की कमी को कभी कोई पूरा नहीं कर सकता, लेकिन हमें इस बात का फख्र है कि हमारे घर के चिराग ने देश की अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है।”
Sasaram प्रेरणा पुंज बनी मनीष रंजन की शहादत
मनीष रंजन की शहादत केवल एक परिवार की क्षति नहीं है, बल्कि यह रोहतास जिले और पूरे बिहार के लिए गौरव का विषय है। इस मौके पर मौजूद गणमान्य व्यक्तियों और युवाओं ने कहा कि मनीष जैसे अधिकारियों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रप्रेम की एक नई मशाल जलाता है। कार्यक्रम के अंत में दो मिनट का मौन रखकर शहीद की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। सासाराम की सड़कों पर आज हर कोई उस जांबाज अधिकारी की वीरता की चर्चा कर रहा था, जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना सीमा पार से आने वाली साजिशों को नाकाम करने में अपना जीवन समर्पित कर दिया।
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