Report by: Ravindra Singh
Mahasamund : छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में खनिज न्यास निधि (DMF) के उपयोग को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित ‘गढ़कलेवा’ को विस्थापित कर बनाए गए ‘पालना घर’ के निर्माण में वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे हैं। लगभग 10 लाख रुपये की इस परियोजना में सरकारी नियमों को ताक पर रखकर राशि बंदरबांट करने का मामला अब तूल पकड़ रहा है।
Mahasamund वित्तीय नियमों की अनदेखी और अग्रिम भुगतान का विवाद
सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व पार्षद पंकज साहू ने इस मामले की शिकायत करते हुए बताया कि पालना घर के लिए स्वीकृत ₹9,99,133 की राशि के वितरण में भारी अनियमितता बरती गई है। आरोपों के अनुसार, महिला एवं बाल विकास विभाग के तत्कालीन अधिकारियों ने भंडार क्रय नियमों का उल्लंघन करते हुए अपने ही नाम पर और अन्य अधिकारियों के नाम पर चेक और RTGS के माध्यम से हजारों रुपये का अग्रिम भुगतान लिया। नियमों के विरुद्ध इस तरह का सीधा भुगतान सीधे तौर पर वित्तीय अनुशासनहीनता की ओर इशारा करता है।
Mahasamund PWD और वेंडरों की भूमिका पर उठते सवाल
इस परियोजना में लोक निर्माण विभाग (PWD) की भूमिका को लेकर भी संदेह जताया जा रहा है। कागजों में PWD को सप्लायर के रूप में दर्शाकर एयर कंडीशनर, CCTV कैमरे और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के नाम पर ₹2,65,590 का भुगतान किया गया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि एक ही प्रकार की सामग्री के लिए अलग-अलग वेंडरों को अलग-अलग कीमतें चुकाई गईं। उदाहरण के तौर पर, एक ब्रांडेड LED टीवी ₹19,200 में खरीदा गया, जबकि उसी आकार के एक गैर-ब्रांडेड टीवी के लिए ₹35,714 का भुगतान किया गया, जो बाजार मूल्य से कहीं अधिक है।
Mahasamund बिना टेंडर प्रक्रिया के मनमानी खरीदी के आरोप
शिकायतकर्ता का दावा है कि पूरे प्रोजेक्ट के दौरान टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। किचन के सामान, फर्नीचर और सजावट के लिए मनमाने बिल पेश किए गए। पंकज साहू का कहना है कि यह केवल एक मामला है, जबकि DMF फंड के करोड़ों रुपये इसी तरह के संदिग्ध तरीकों से खर्च किए जा रहे हैं। उन्होंने इस पूरे प्रकरण में ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988’ के तहत मामला दर्ज कर उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की है।
Mahasamund विभाग की सफाई और प्रशासन का रुख
दूसरी ओर, महिला एवं बाल विकास विभाग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि पूरी खरीदी प्रक्रिया पारदर्शी रही है और सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए गए हैं। विभाग के अनुसार, जांच प्रतिवेदन तैयार कर जिला कलेक्टर को सौंपा जाएगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या प्रशासन इन आरोपों की गंभीरता से जांच कराता है या यह मामला फाइलों में ही दबकर रह जाता है।
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