By: Ravindra Singh
Indira Ekadashi : पितृ पक्ष में आने वाली एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस व्रत को पितरों की शांति और मोक्ष से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि इंदिरा एकादशी का व्रत और भगवान विष्णु की आराधना करने से पितरों को पुण्य प्राप्त होता है। इस बार इंदिरा एकादशी 6 अक्टूबर 2026 को मनाई जा रही है। कहा जाता है कि इस व्रत की कथा सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। आइए जानते हैं इंदिरा एकादशी की पौराणिक कथा और इससे जुड़ी मान्यताएं।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था महत्व
Indira Ekadashi पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि यह व्रत पापों से मुक्ति और पितरों के कल्याण के लिए विशेष माना जाता है। इसके बाद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को राजा इंद्रसेन की कथा सुनाई।
महिष्मति के राजा थे इंद्रसेन
Indira Ekadashi प्राचीन समय में महिष्मति नाम की नगरी में इंद्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा शासन करते थे। वह अपनी प्रजा का पालन धर्म और न्याय के साथ करते थे। राजा भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे और नियमित रूप से उनकी आराधना किया करते थे।
एक दिन राजा अपनी राजसभा में बैठे थे। उसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे। राजा ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उनके आने का कारण पूछा। नारद मुनि ने राजा को बताया कि वे यमलोक गए थे और वहां उन्होंने उनके पिता को देखा।
यमलोक में कष्ट भोग रहे थे राजा के पिता
Indira Ekadashi नारद मुनि ने बताया कि राजा इंद्रसेन के पिता अपने पूर्व कर्मों के कारण यमलोक में कष्ट झेल रहे हैं। उन्होंने राजा के लिए एक संदेश भी दिया। उनके पिता ने कहा था कि यदि इंद्रसेन आश्विन कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत उनके निमित्त करें, तो उन्हें इस कष्ट से मुक्ति मिल सकती है और स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है।
यह सुनकर राजा चिंतित हो गए और उन्होंने नारद मुनि से इंदिरा एकादशी व्रत की सही विधि बताने का अनुरोध किया।
नारद मुनि ने बताई व्रत की विधि
Indira Ekadashi देवर्षि नारद ने राजा को बताया कि एकादशी से एक दिन पहले दशमी तिथि पर स्नान करके श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करना चाहिए। इसके बाद एक समय भोजन करने की परंपरा बताई गई है।
एकादशी के दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए। भगवान विष्णु और शालिग्राम स्वरूप की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। धूप, दीप, पुष्प, गंध और नैवेद्य आदि अर्पित कर भगवान का स्मरण किया जाता है। पितरों की शांति के लिए श्रद्धापूर्वक धार्मिक कर्म किए जाते हैं और जरूरतमंदों या योग्य ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा देने की परंपरा है।
राजा इंद्रसेन के व्रत से पिता को मिला मोक्ष
Indira Ekadashi राजा ने देवर्षि नारद द्वारा बताई गई विधि के अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत किया। उन्होंने अपने परिवार और सहयोगियों के साथ भगवान विष्णु की पूजा की तथा पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान किए।
धार्मिक कथा के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से राजा के पिता को यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिली और वे भगवान विष्णु के लोक को चले गए। कथा में यह भी वर्णन मिलता है कि इंद्रसेन ने बाद में अपने पुत्र को राज्य की जिम्मेदारी सौंप दी और स्वयं भी पुण्य प्राप्त कर स्वर्गलोक को गए।
इंदिरा एकादशी पर क्यों किया जाता है पितरों का स्मरण?
Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के दौरान आती है, इसलिए इस दिन पितरों के निमित्त पूजा, तर्पण, श्राद्ध और दान का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ पितरों का स्मरण करने से परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य भी कर सकते हैं।
धार्मिक मान्यता: इंदिरा एकादशी व्रत की यह कथा और इससे जुड़े फल धार्मिक आस्था एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनके वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं किया जाता है।
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