By: Ravindra Singh
Hal Chhath : हिंदू धर्म में हल षष्ठी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। जन्माष्टमी से पहले आने वाला यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को बलराम जी का जन्म हुआ था। इसी वजह से इस दिन को बलराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।
संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से माताएं इस दिन व्रत रखती हैं और विधि-विधान से पूजा करती हैं। कई स्थानों पर यह पर्व पारिवारिक सुख-समृद्धि और संतान की रक्षा से भी जोड़ा जाता है।
हल छठ के कई हैं नाम
Hal Chhath देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कहीं इसे हल छठ, कहीं हर छठ, ललही छठ, संतान छठ, देव छठ और खमर छठ कहा जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार पूजा की विधि और नियमों में कुछ अंतर देखने को मिलता है।
हालांकि नाम और रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं, लेकिन इस व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की प्रार्थना करना है।
2 सितंबर 2026 को रखा जाएगा हल षष्ठी व्रत
Hal Chhath साल 2026 में हल षष्ठी का व्रत 2 सितंबर, बुधवार को रखा जा रहा है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। जन्माष्टमी से दो दिन पहले आने वाले इस पर्व पर भगवान बलराम की पूजा की जाती है और माताएं अपनी संतान के मंगल की कामना करती हैं।
हल छठ पर किन नियमों का पालन किया जाता है?
Hal Chhath हल षष्ठी का नाम भगवान बलराम के प्रमुख अस्त्र हल से जुड़ा माना जाता है। कृषि और खेती-किसानी से भी इस पर्व का गहरा संबंध है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में किसान इस अवसर पर हल तथा खेती में इस्तेमाल होने वाले अन्य उपकरणों की पूजा करते हैं।
व्रत के दौरान हल से जोती गई जमीन से प्राप्त अनाज और खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता। कई परंपराओं में गाय के दूध, दही और घी को भी वर्जित माना गया है। इसके बजाय तालाब, नदी या अन्य जलस्रोतों के आसपास प्राकृतिक रूप से उगने वाले खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करने की परंपरा है।
हल षष्ठी की पूजा में क्या सामग्री लगती है?
Hal Chhath हल छठ की पूजा सामग्री स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। कई जगह गोबर से पूजा स्थल तैयार किया जाता है। इसके बाद झरबेरी, पलाश और कांस की टहनियों को एक साथ बांधकर पूजा स्थान पर स्थापित किया जाता है।
पूजा में चना, गेहूं, जौ, धान, अरहर, मूंग, मक्का और महुआ आदि का इस्तेमाल भी किया जाता है। षष्ठी माता और भगवान बलराम का स्मरण करते हुए श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।
हल षष्ठी की सरल पूजा विधि
Hal Chhath हल षष्ठी के दिन व्रती महिलाएं सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद पूजा स्थल को साफ कर पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है।
गोबर से पूजा स्थान बनाने के बाद झरबेरी, पलाश और कांस की टहनियां रखी जाती हैं। इसके बाद षष्ठी माता और भगवान बलराम का ध्यान करके चंदन, अक्षत, फूल, फल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।
पूजा के बाद हल षष्ठी की कथा सुनी या पढ़ी जाती है। अंत में संतान की लंबी आयु और सुखी जीवन के लिए प्रार्थना की जाती है। कई जगह बच्चों को चना, मक्का, महुआ, धान का लावा और अन्य पारंपरिक चीजें प्रसाद के रूप में दी जाती हैं।
हल षष्ठी की प्रचलित कथा
दूध बेचने वाली ग्वालिन की कहानी
Hal Chhath लोकप्रिय धार्मिक कथा के अनुसार, एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। उसके प्रसव का समय नजदीक था। वह प्रसव पीड़ा के साथ-साथ इस चिंता में भी थी कि अगर घर पर बच्चा पैदा हो गया तो वह दूध-दही बेचने के लिए नहीं जा पाएगी।
इसी लालच में वह दूध-दही से भरे बर्तन लेकर घर से निकल पड़ी। रास्ते में अचानक उसे तेज प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। वह एक झरबेरी की झाड़ी के पास पहुंची और वहीं एक पुत्र को जन्म दिया।
बच्चे को जन्म देने के बाद भी उसके मन में दूध-दही बेचने की चिंता बनी रही। उसने नवजात को झरबेरी के नीचे छोड़ दिया और खुद गांव में दूध-दही बेचने चली गई।
व्रत के नियमों से किया खिलवाड़
Hal Chhath उस दिन हल षष्ठी का पर्व था। मान्यता के अनुसार इस दिन हल से जुती भूमि में पैदा हुए अनाज और गाय के दूध से बने पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता था। ग्वालिन ने गाय और भैंस के दूध को मिला रखा था।
लोगों को अपना दूध बेचने के लिए उसने गाय के दूध को भी भैंस का दूध बताकर बेच दिया। इस तरह उसने अपने स्वार्थ के लिए लोगों से झूठ बोला और उनके व्रत के नियमों का उल्लंघन करवाया।
किसान के हल से घायल हुआ बच्चा
Hal Chhath इधर, झरबेरी के पास एक किसान अपने खेत में हल चला रहा था। अचानक उसके बैल बिदक गए और हल का फल पीछे की ओर चला गया। वहां पड़ा ग्वालिन का बच्चा उसकी चपेट में आ गया और गंभीर रूप से घायल हो गया।
किसान ने जब बच्चे को देखा तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने बच्चे की हालत सुधारने के लिए झरबेरी के कांटों की मदद से उसके घाव को सी दिया और वहां से चला गया।
अपनी गलती का हुआ एहसास
Hal Chhath कुछ समय बाद ग्वालिन दूध-दही बेचकर वापस लौटी। अपने बच्चे की हालत देखकर वह बेहद परेशान हो गई। उसे अपने किए हुए झूठ का एहसास हुआ। उसने इसे अपने स्वार्थ और व्रत के नियमों के उल्लंघन का परिणाम माना।
इसके बाद उसने गांव की उन सभी महिलाओं के पास जाकर अपनी गलती स्वीकार की, जिनसे उसने झूठ बोलकर दूध बेचा था। उसने उनसे क्षमा मांगी और पूरी घटना बताई।
महिलाओं ने उसके पछतावे को देखते हुए उसे माफ कर दिया और उसके बच्चे के लिए मंगलकामना की।
आशीर्वाद के बाद जीवित मिला पुत्र
Hal Chhath कथा के अनुसार, महिलाओं से क्षमा और आशीर्वाद लेने के बाद जब ग्वालिन वापस झरबेरी के पास पहुंची तो उसने अपने बच्चे को जीवित पाया। यह देखकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
ग्वालिन ने इसे हल षष्ठी माता की कृपा और सच्चे पश्चाताप का फल माना। उसने माता से सभी माताओं और उनकी संतानों पर अपनी कृपा बनाए रखने की प्रार्थना की।
गुजरात में राधन छठ के नाम से मनाते हैं
Hal Chhath हल षष्ठी की परंपराएं हर क्षेत्र में समान नहीं हैं। गुजरात में इसे राधन छठ के नाम से मनाया जाता है। यहां इस अवसर पर शीतला माता की पूजा करने की परंपरा है।
उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में षष्ठी देवी और छठी मैया की आराधना की जाती है। कुछ जगह यह दिन भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जबकि कई क्षेत्रों में इसका मुख्य संबंध संतान की रक्षा और दीर्घायु से है।
हल षष्ठी का धार्मिक महत्व
Hal Chhath धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और नियमों के साथ हल षष्ठी का व्रत करने से भगवान बलराम और षष्ठी माता की कृपा प्राप्त होती है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से यह व्रत करती हैं।
यह पर्व केवल संतान से जुड़ी मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि, प्रकृति और ग्रामीण जीवन से भी इसका गहरा संबंध है। हल और खेती से जुड़ी वस्तुओं का सम्मान करना तथा कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग करना इस पर्व की पारंपरिक विशेषताओं में शामिल है।
इस तरह हल षष्ठी श्रद्धा, मातृत्व, संतान के मंगल और कृषि संस्कृति को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।
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