Indus Water Treaty : भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक और रणनीतिक हलचल तेज हो गई है। हिमाचल प्रदेश में भारत की प्रस्तावित ‘चिनाब-ब्यास लिंक टनल’ योजना को लेकर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में गहरी चिंता देखी जा रही है। भारत की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को जहां उत्तर भारत में जल प्रबंधन और बिजली उत्पादन के लिए गेम-चेंजर माना जा रहा है, वहीं इसे क्षेत्रीय जल संसाधनों के उपयोग से जुड़ी एक बड़ी रणनीतिक पहल के तौर पर भी देखा जा रहा है।
Indus Water Treaty क्या है चिनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट और इसके फायदे?
सुरंग से मुड़ेगा पानी: इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति में बहने वाली चंद्र नदी के अतिरिक्त पानी को लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग (टनल) के जरिए ब्यास नदी बेसिन तक पहुंचाना है। गौरतलब है कि चंद्र और भागा नदियां मिलकर ही आगे चलकर चिनाब नदी बनती हैं।
उत्तर भारत को बड़ी सौगात: इस टनल के बनने से हिमाचल प्रदेश में पनबिजली (हाइड्रोपावर) उत्पादन की क्षमता में भारी इजाफा होगा। इसके साथ ही पंजाब, हरियाणा और राजस्थान सहित पूरे उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में सिंचाई व्यवस्था मजबूत होगी, जिससे कृषि क्षेत्र को सीधा लाभ मिलेगा।
Indus Water Treaty ब्यास बेसिन में ट्रांसफर पर क्यों भड़का पाकिस्तान?
अधिकार क्षेत्र का मामला: इस पूरी योजना की सबसे खास बात यह है कि चंद्र नदी (चिनाब का हिस्सा) का अतिरिक्त पानी ब्यास नदी में भेजा जाएगा। सिंधु जल समझौते के तहत ब्यास नदी के पानी के पूर्ण इस्तेमाल का अधिकार भारत के पास सुरक्षित है। भारत के इसी कदम से पाकिस्तान के रणनीतिक हलकों में खलबली मची है।
पाकिस्तानी नेताओं ने उठाए सवाल: पाकिस्तान के पूर्व सीनेटर और पंजाब प्रांत के पूर्व सिंचाई मंत्री मोहसिन लगारी सहित वहां के कई जल विशेषज्ञों ने इस प्रोजेक्ट पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि एक नदी बेसिन से दूसरी नदी बेसिन में पानी ट्रांसफर करना सिंधु जल समझौते की मूल भावना के खिलाफ है।
Indus Water Treaty पानी की मात्रा कम, फिर भी क्यों बढ़ी पड़ोसी की बेचैनी?
पाकिस्तानी विशेषज्ञों का खुद यह मानना है कि इस टनल के जरिए मोड़ा जाने वाला पानी, चिनाब नदी के सालाना कुल बहाव का एक बहुत छोटा सा हिस्सा मात्र है। इसके बावजूद, वे पानी की मात्रा से ज्यादा इस बात से परेशान हैं कि भारत ने नदियों के प्रबंधन और उनके रुख को मोड़ने की तकनीक पर काम शुरू कर दिया है। जानकारों के मुताबिक, भारत पिछले कुछ सालों से अपनी जल सुरक्षा, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की नीति पर तेजी से काम कर रहा है, और यह मेगा प्रोजेक्ट उसी दीर्घकालिक रणनीति का एक बड़ा हिस्सा है।

