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रिपोर्टर: रविन्‍द्र सिंह

Muzaffarpur : बिहार की धरती के गर्भ से समय-समय पर निकलने वाली प्राचीन मूर्तियां अब अपने निर्माण काल, शैली और पत्थरों के इतिहास की अनकही कहानियां खुद बयां करेंगी। ‘भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत ट्रस्ट’ (INTACH) बिहार के विभिन्न जिलों में खुदाई के दौरान मिली भगवान सूर्य की ऐतिहासिक प्रतिमाओं का एक विस्तृत दस्तावेजीकरण (रिकॉर्ड) तैयार कर रहा है। इस शोध के तहत शुंग-कुषाण काल से लेकर गुप्त, पाल-कर्नाट और मध्यकाल तक की मूर्तियों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जा रहा है, जिससे भारतीय मूर्तिकला शैली को समझने में बड़ी मदद मिलेगी।

Muzaffarpur पालकालीन मूर्तियों की अनूठी विशेषता: हाथों में कमल और पैरों में ‘बूट’

बिहार में अब तक मिली सूर्य प्रतिमाओं में सबसे बड़ी संख्या ‘पाल राजवंश’ के कालखंड की है। इतिहासकारों के अनुसार, पालवंश के दौरान मगध और मिथिलांचल के क्षेत्रों में सूर्य पूजा को विशेष प्राथमिकता दी जाती थी। इस काल की मूर्तियों की बनावट में एक खास एकरूपता देखने को मिलती है। इन प्रतिमाओं में भगवान सूर्य को समभंग (खड़ी) मुद्रा में दर्शाया गया है, जिनके दोनों हाथों में खिले हुए कमल के फूल हैं, कमर में करधनी (पेटी) बंधी है और सबसे दिलचस्प बात यह है कि उनके पैरों में लंबे बूट के आकार के जूते नक्काशीदार रूप में दिखाई देते हैं।

9वीं-10वीं सदी ईस्वी
12वीं-13वीं सदी ईस्वी
17वीं-18वीं सदी ईस्वी

Muzaffarpur मुजफ्फरपुर, शिवहर और जमुई में मिले इतिहास के अंश

हाल के वर्षों में बिहार के विभिन्न हिस्सों से पाल राजवंश के समय की कई ऐतिहासिक मूर्तियां बरामद की गई हैं, जो वर्तमान में पुरातत्वविदों के लिए गहन शोध का विषय बनी हुई हैं। उदाहरण के तौर पर, साल 2023 के दौरान मुजफ्फरपुर जिले के मुशहरी अंतर्गत सुस्ता पंचायत से नौवीं शताब्दी की एक अति प्राचीन सूर्य प्रतिमा मिली थी, जिसे सुरक्षा के दृष्टिकोण से रामचंद्र शाही संग्रहालय में संरक्षित किया गया है।

इसी प्रकार, फरवरी 2024 में जमुई के सिझौड़ी इलाके में एक तालाब के सौंदर्यीकरण और खुदाई कार्य के दौरान लगभग तीन फीट ऊंची पालकालीन सूर्य देव की मूर्ति प्राप्त हुई थी। इसके अतिरिक्त, मई 2025 में शिवहर के देकुलीधाम के समीप हुई खुदाई में भी ढाई फीट लंबी और 100 किलोग्राम से अधिक वजनी एक अत्यंत भव्य सूर्य प्रतिमा मिली, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मुख्य सूर्य विग्रह के साथ-साथ छह अन्य देवी-देवताओं की भी बेहद बारीक व सुंदर नक्काशी की गई है; इस बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहर को वर्तमान में दरभंगा के चंद्रधारी संग्रहालय में सहेजकर रखा गया है।

Muzaffarpur वैशाली की मृण्मूर्ति है सबसे प्राचीन; 20 जून को आएगी पूरी रिपोर्ट

पुरातत्वविदों के अनुसार, बिहार में सूर्य देव की सबसे प्राचीन कलाकृति वैशाली के कोल्हुआ में बौद्ध अवशेषों के साथ उत्खनन के दौरान मिली थी। मिट्टी से बनी यह ‘शुंग कालीन सूर्य मृण्मूर्ति’ वर्तमान में बिहार संग्रहालय (पटना) में संरक्षित है और इसे राज्य की सबसे पुरानी सूर्य आकृति माना जाता है।

“बिहार के अलग-अलग मंदिरों और संग्रहालयों में रखी करीब 150 से अधिक सूर्य प्रतिमाओं के प्रलेखन, इतिहास यात्रा और निर्माण शैली का प्रामाणिक रिकॉर्ड तैयार कर लिया गया है। इन मूर्तियों का कालखंड 200 वर्ष से लेकर 2200 वर्ष तक पुराना है। आगामी 20 जून तक इंटैक (INTACH) इस पूरी रिसर्च पर आधारित अपनी समेकित रिपोर्ट प्रकाशित करने जा रहा है।”

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