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रिपोर्टर: संजीव कुमार शर्मा

Bokaro : औद्योगिक नगरी बोकारो स्टील सिटी की चकाचौंध के पीछे एक स्याह हकीकत छिपी है, जो यहां की एक बड़ी आबादी को तिल-तिल मरने पर मजबूर कर रही है। मराफारी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बीएसएल लेबर हाउसिंग (LH) से सटी दर्जनों बस्तियों के करीब 15 हजार लोग आज के आधुनिक दौर में भी शुद्ध पेयजल की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि लोगों का आधा दिन सिर्फ पानी के इंतजाम में, लंबी लाइनों में खड़े होकर बीत जाता है।

Bokaro भूजल बना ‘धीमा जहर’, मानक से दोगुना मिला टीडीएस

झोपड़ी कॉलोनी, कदम गाछ, जटान टोला, रांची टोला, आजाद नगर और धोबी मोहल्ला जैसे घने बसे इलाकों में लगे सरकारी ट्यूबवेल अब पानी नहीं बल्कि ‘धीमा जहर’ उगल रहे हैं। वैज्ञानिक जांच और आंकड़ों के मुताबिक, इन इलाकों के अंडरग्राउंड वाटर (भूजल) में टीडीएस (TDS – Total Dissolved Solids) का स्तर 900 से 1000 पीपीएम (PPM) को पार कर चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो 500 पीपीएम से अधिक टीडीएस वाला पानी इंसानी शरीर के लिए बेहद घातक है, जो किडनी और पेट की गंभीर बीमारियों को न्यौता देता है।

Bokaro पानी के चक्कर में थम गई जिंदगी, भारी धातुओं की मिलावट

गैर सरकारी संस्था ‘बेहतर झारखंड’ की शोध रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक अपशिष्टों के रिसाव के कारण इस क्षेत्र के पानी में भारी धातुओं (Heavy Metals) की मिलावट हो चुकी है, जिससे पानी अत्यधिक कठोर और क्षारीय हो गया है। इस खारेपन के डर से ग्रामीणों ने स्थानीय चापाकलों का पानी पीना छोड़ दिया है। अब वे पानी के लिए कई किलोमीटर दूर विश्वकर्मा मैदान के पास स्थित डीप बोरिंग पर निर्भर हैं। महिलाएं, बुजुर्ग और मासूम बच्चे भीषण गर्मी और विपरीत हालातों में भारी-भारी बर्तन सिर पर ढोने को मजबूर हैं, जिससे उनकी पढ़ाई और रोजगार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

Bokaro प्रशासनिक बेरुखी: हजारों जिंदगियां दांव पर, विभाग अनजान

इस मानवीय संकट का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि इस गंभीर और जानलेवा समस्या से पूरा इलाका त्रस्त है, लेकिन जिला पेयजल एवं स्वच्छता विभाग इस जमीनी हकीकत से बेखबर होने का दावा कर रहा है। प्रशासन की यह कथित उदासीनता और शुतुरमुर्गी रवैया स्थानीय व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है। अब देखना यह है कि बुनियादी हक के लिए संघर्ष कर रहे बोकारो के इन हजारों परिवारों को कब स्वच्छ जल का अधिकार मिलता है और कब उनकी सुध ली जाती है।

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