Indus Waters Treaty : अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद एक बार फिर गर्मा गया है। ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में आयोजित एक उच्च स्तरीय वैश्विक जल सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) का मुद्दा उठाया। पाकिस्तान का कहना है कि इस ऐतिहासिक समझौते को किसी भी तरह से रोकना या निलंबित करना आने वाले समय के लिए एक बेहद खतरनाक मिसाल बन सकता है।
Indus Waters Treaty अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के आरोप
सम्मेलन में पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण समन्वय मंत्री डॉ. मुसादिक मलिक ने भारत पर जल संसाधनों का राजनीतिकरण करने का आरोप मढ़ा। उन्होंने दलील दी कि सीमाओं के पार बहने वाली नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करने वाले एकतरफा निर्णय न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को बिगाड़ते हैं, बल्कि इससे दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा और जल संकट का खतरा भी बढ़ सकता है। पाकिस्तानी मंत्री ने भारत से अपील की कि वह अंतरराष्ट्रीय नियमों और मध्यस्थता तंत्र का सम्मान करे।
Indus Waters Treaty आतंकी हमले के बाद भारत का सख्त रुख
दोनों देशों के बीच इस विवाद की मुख्य वजह अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ भीषण आतंकी हमला है। सीमा पार से जारी आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कई सख्त फैसले लिए थे, जिसमें सिंधु जल संधि को स्थगित करना भी शामिल था। भारत का स्पष्ट मानना था कि एक तरफ आतंकवाद को बढ़ावा देना और दूसरी तरफ सामान्य द्विपक्षीय समझौतों का लाभ उठाना, दोनों चीजें एक साथ नहीं चल सकतीं। इस फैसले के बाद पाकिस्तान ने इसे ‘युद्ध जैसी कार्रवाई’ करार दिया था।
Indus Waters Treaty क्या है सिंधु जल संधि और पानी का गणित?
साल 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से अस्तित्व में आई सिंधु जल संधि के तहत दोनों देशों के बीच छह नदियों के पानी का बंटवारा किया गया था।
- पश्चिमी नदियां: सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी का मुख्य अधिकार पाकिस्तान को मिला, हालांकि भारत को इन पर सीमित पनबिजली और घरेलू उपयोग की अनुमति है।
- पूर्वी नदियां: रावी, व्यास और सतलुज के पानी के इस्तेमाल का पूरा अधिकार भारत के पास है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बदलते भू-राजनीतिक परिवेश और आतंकवाद के मुद्दे के कारण यह छह दशक पुराना समझौता अब गंभीर कूटनीतिक तनाव के केंद्र में आ गया है।

