रिपोर्टर: आगस्टीन हेम्बरम
Dumka : दुमका स्थित फूलो झानो मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में सुविधाओं का घोर अभाव है। यहाँ का पोस्टमार्टम हाउस सुविधाओं के अभाव में खुद ‘दम तोड़’ रहा है। पोस्टमार्टम करने के लिए आवश्यक उपकरणों तक की व्यवस्था नहीं है। आलम यह है कि पोस्टमार्टम करने वाले कर्मियों को शव उठाने से लेकर चीर-फाड़ और सिलाई तक के लिए खुद ही संसाधनों का जुगाड़ करना पड़ता है। अस्पताल प्रशासन की ओर से बुनियादी सुविधाएं न मिलने के कारण कर्मी जैसे-तैसे काम चलाने को मजबूर हैं।

Dumka नियुक्ति का अभाव: सफाई कर्मी के कंधों पर पोस्टमार्टम का जिम्मा
फुलो झानो मेडिकल कॉलेज अस्पताल में अब तक सरकार की ओर से किसी आधिकारिक पोस्टमार्टम कर्मी की नियुक्ति नहीं की गई है। अस्पताल में सफाई कर्मी के पद पर तैनात धतोरी मेहतर ही पिछले लंबे समय से शवों के पोस्टमार्टम का कार्य कर रहे हैं। धतोरी को सफाई कर्मी के रूप में 9,000 रुपये मानदेय मिलता है, लेकिन पोस्टमार्टम जैसे चुनौतीपूर्ण कार्य के लिए उन्हें कोई अतिरिक्त भत्ता या मानदेय नहीं दिया जाता। अस्पताल अधीक्षक डॉ. रुबेन हेम्बरम ने भी स्वीकार किया है कि फिलहाल सफाई कर्मी के भरोसे ही यह व्यवस्था चल रही है।
Dumka जेब से खर्च: सूआ-धागा और लेबर का पैसा खुद भरते हैं कर्मी
पोस्टमार्टम हाउस में संसाधनों की कमी इस कदर है कि धतोरी मेहतर को शवों की सिलाई के लिए सूआ और सूतरी (मजबूत धागा) बाजार से खुद खरीदना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एक शव के पोस्टमार्टम पर औसतन 500 से 600 रुपये का खर्च आता है। यदि सहायता के लिए दो मजदूरों को बुलाया जाए, तो उन्हें अलग से भुगतान करना पड़ता है। हैरानी की बात यह है कि सर्जिकल ब्लेड, पीपीई किट, मार्कर, सील और विसरा डिब्बे जैसे अनिवार्य उपकरण भी अस्पताल से उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। लावारिस शवों के मामले में तो सारा आर्थिक बोझ कर्मी की ही जेब पर पड़ता है।
Dumka खस्ताहाल बुनियादी ढांचा: भीषण गर्मी में खराब पंखे के बीच काम
अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस की स्थिति नारकीय बनी हुई है। यहाँ महीने में औसतन 40 से 50 पोस्टमार्टम होते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का नामोनिशान नहीं है। धतोरी मेहतर के अनुसार, पोस्टमार्टम हाउस का पंखा पिछले दो सप्ताह से अधिक समय से खराब पड़ा है, जिसे बार-बार शिकायत के बावजूद ठीक नहीं कराया गया है। ऐसी स्थिति में कर्मियों को दुर्गंध और भीषण गर्मी के बीच काम करना पड़ रहा है। कभी-कभी मृतक के परिजन प्लास्टिक जैसी सामग्री उपलब्ध करा देते हैं, अन्यथा पूरी व्यवस्था ‘जुगाड़’ के सहारे ही चल रही है।
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