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Report by: Avinash Srivastwa

Rohtas : जहाँ एक ओर दुनिया मंगल ग्रह पर बस्तियाँ बसाने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से भविष्य संवारने की बात कर रही है, वहीं बिहार के रोहतास जिले के संझौली प्रखंड में समय जैसे ठहर सा गया है। यहाँ के घिन्हू ब्रह्म स्थान पर हर साल चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान एक ऐसा मेला लगता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘भूतों का मेला’ कहा जाता है। यह स्थान आधुनिक विज्ञान और प्राचीन लोक-मान्यताओं के बीच एक अजीबोगरीब द्वंद्व का केंद्र बना हुआ है।

मेले का डरावना दृश्य और तांत्रिक अनुष्ठान

Rohtas चैत्र नवरात्र के नौ दिनों तक चलने वाला यह मेला लगभग 2 किलोमीटर के दायरे में फैला होता है। यहाँ का नजारा किसी सामान्य धार्मिक उत्सव से बिल्कुल अलग और रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। चारों तरफ चीख-पुकार, ढोल-नगाड़ों की थाप और मंत्रोच्चार के बीच अजीब हरकतें करते लोग नजर आते हैं।

इस मेले में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक होती है। कई महिलाएँ खुले बालों के साथ जमीन पर लोटती, झूमती और चिल्लाती दिखाई देती हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इन पर ‘ऊपरी साया’ या नकारात्मक शक्तियों का वास है। यहाँ मौजूद तांत्रिक, जिन्हें स्थानीय भाषा में ओझा कहा जाता है, झाड़-फूंक और मार-पीट के जरिए इन ‘आत्माओं’ को भगाने का दावा करते हैं। तांत्रिकों का तर्क होता है कि वे इंसान को नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी बुरी शक्ति को सजा दे रहे हैं।

घिन्हू ब्रह्म की पौराणिक कथा और ‘श्राप’ का रहस्य

Rohtas इस मेले के पीछे एक सदी पुरानी लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि घिन्हू ब्रह्म मूल रूप से माधवपुर के निवासी थे। एक बार अपनी शक्ति के प्रदर्शन के दौरान वे बीमार पड़ गए। जब उन्होंने पानी माँगा, तो रौनी गांव के लोगों ने उनकी मदद की, जबकि पौनी गांव के लोगों ने उनका उपहास उड़ाया।

आहत होकर घिन्हू ब्रह्म ने रौनी को फलने-फूलने और पौनी को विनाश का श्राप दे दिया। स्थानीय लोग आज भी दावा करते हैं कि उस श्राप के कारण पौनी गांव एक खंडहरनुमा टीले में तब्दील हो गया, जबकि रौनी गांव आज भी समृद्ध है। इसी स्थान पर उनकी मृत्यु के बाद ‘ब्रह्म स्थान’ बनाया गया, जो अब उत्तर प्रदेश और झारखंड तक के लोगों की आस्था (या अंधविश्वास) का केंद्र है।

सामाजिक सच्चाई और शराबबंदी की चुनौतियाँ

Rohtas यह मेला केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग की बेबसी को भी दर्शाता है। यहाँ आने वाले अधिकांश लोग स्वास्थ्य सुविधाओं और मानसिक उपचार के अभाव में इन तांत्रिकों की शरण लेते हैं।

एक चौंकाने वाली बात यह भी है कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी के बावजूद, इस मेले में ‘चढ़ावे’ के नाम पर शराब की बोतलें देखी जाती हैं। तांत्रिक सत्येंद्र पासवान जैसे लोग, जो दशकों से यहाँ आ रहे हैं, इसे लोगों के कष्ट दूर करने का मार्ग बताते हैं। हालांकि, मनोवैज्ञानिक इसे ‘मास हिस्टीरिया’ या मानसिक विकार का नाम देते हैं, जिसे आस्था का चोला पहना दिया गया है।

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