By: Yogendra Singh
Koriya : छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की एक विचलित करने वाली तस्वीर सामने आई है। कटघोडी स्थित आदिवासी बालक प्री-मैट्रिक छात्रावास, जिसे आदिवासी छात्रों के बेहतर भविष्य और सुविधा के लिए बनाया गया था, आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। लगभग 1.74 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी यह भवन निर्माण के कुछ समय भीतर ही खंडहर में तब्दील होने लगा है। करोड़ों की लागत से तैयार इस इमारत की दीवारों और छतों में आई गहरी दरारें न केवल घटिया निर्माण सामग्री की पोल खोल रही हैं, बल्कि यहां रहने वाले मासूम छात्रों के जीवन को भी खतरे में डाल रही हैं।
बदहाल बाथरूम और खुले में नहाने की मजबूरी
Koriya छात्रावास की सबसे दयनीय स्थिति यहां की स्वच्छता सुविधाओं की है। करोड़ों रुपये के बजट में आधुनिक शौचालयों और स्नानागारों का प्रावधान था, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। छात्रावास के बाथरूम पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं और उपयोग के लायक नहीं बचे हैं।
इसका परिणाम यह है कि यहां रहने वाले छात्र कड़ाके की ठंड हो या चिलचिलाती धूप, छात्रावास परिसर के बाहर एक पाइप के सहारे खुले में नहाने और कपड़े धोने को मजबूर हैं। यह न केवल छात्रों की निजता का हनन है, बल्कि स्वच्छता के अभाव में उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है। कई बार गुहार लगाने के बावजूद प्रशासन ने अब तक इन मूलभूत सुविधाओं को दुरुस्त करने की जहमत नहीं उठाई है।
सुरक्षा ताक पर: बिजली के नंगे तार और गायब मुख्य द्वार
Koriya छात्रावास के भीतर कदम रखते ही अव्यवस्थाओं का अंबार दिखाई देता है। कमरों में लगे बिजली के बोर्ड टूटे हुए हैं और नंगे तार बाहर लटक रहे हैं, जिससे हर वक्त किसी बड़े हादसे या करंट लगने का डर बना रहता है। छोटे बच्चों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है।
सुरक्षा की चूक यहीं खत्म नहीं होती; छात्रावास परिसर में मुख्य गेट (Main Gate) तक नहीं है। बिना बाउंड्री वॉल और गेट के, छात्रावास में बाहरी तत्वों और जंगली जानवरों के प्रवेश का खतरा हमेशा बना रहता है। करोड़ों रुपये की लागत वाली परियोजना में एक सुरक्षित गेट न होना जिम्मेदार एजेंसियों और ठेकेदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
जवाबदेही से बचता विभाग और सुधार का खोखला आश्वासन
Koriya इस पूरे मामले के उजागर होने के बाद स्थानीय स्तर पर आक्रोश व्याप्त है। भ्रष्टाचार की बू इस कदर है कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच की मांग उठने लगी है। दूसरी ओर, हमेशा की तरह आदिवासी विकास विभाग के अधिकारी अब मामले पर लीपापोती करने में जुटे हैं।
विभाग का कहना है कि वे जल्द ही व्यवस्थाओं में सुधार करेंगे और आवश्यक मरम्मत कार्य कराए जाएंगे। हालांकि, सवाल यह उठता है कि जब भवन नया था, तब वह इतना जल्दी जर्जर कैसे हो गया? क्या निर्माण के समय अधिकारियों ने गुणवत्ता की जांच नहीं की थी? जब तक दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तब तक आदिवासी छात्रों का भविष्य इसी तरह जर्जर दीवारों के बीच सिमटा रहेगा।
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