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by-Ravindra Sikarwar

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में एक ऐसी त्रासदी ने पूरे इलाके को सदमे में डाल दिया है, जहां मात्र 15 दिनों के दौरान छह मासूम बच्चों की जान गुर्दे की गंभीर समस्या के कारण चली गई। ये बच्चे सभी पांच वर्ष से कम उम्र के थे और शुरुआत में इन्हें मौसमी बुखार व सर्दी-जुकाम जैसी मामूली बीमारी लग रही थी। लेकिन जल्द ही हालात बिगड़ गए, जब बच्चों को पेशाब में कमी और गुर्दे की संक्रमण की शिकायतें होने लगीं। स्थानीय चिकित्सकों ने इन्हें खांसी की सिरप समेत कुछ दवाएं दी थीं, लेकिन उसके बाद स्थिति और खराब हो गई।

इस घटना की शुरुआत 24 अगस्त 2025 को हुई, जब परासिया गांव के एक बच्चे को तेज बुखार व सर्दी की शिकायत हुई। फिर 7 सितंबर को पहली मौत दर्ज की गई, और उसके बाद 4 सितंबर से 26 सितंबर तक पांच और बच्चों ने दम तोड़ दिया। प्रभावित बच्चे मुख्य रूप से तामिया, कोयलांचल, परासिया व न्यूटन चिकली जैसे क्षेत्रों से थे। परिवारों के अनुसार, बच्चे पहले पूरी तरह स्वस्थ थे, लेकिन दवा लेने के बाद अचानक पेशाब बंद हो गया और गुर्दे की कार्यप्रणाली ठप हो गई। कुछ बच्चों को उन्नत इलाज के लिए महाराष्ट्र के नागपुर रेफर किया गया, लेकिन वहां भी तीन की जान बच न सकी। गुर्दे की बायोप्सी जांच में दवाओं में डायथाइलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) नामक जहरीले पदार्थ की मौजूदगी पाई गई, जो औद्योगिक रसायन है और पेंट, स्याही व ब्रेक फ्लूइड में इस्तेमाल होता है। यह पदार्थ ग्लिसरीन में मिल जाता है, जो दवाओं में स्वीट्नर के रूप में उपयोग होता है।

जांचकर्ताओं को शक है कि दो संदिग्ध खांसी की सिरप—कोल्डरिफ व नेक्सट्रो-डीएस—दूषित थीं, जिनमें यह घातक रसायन घुला हुआ था। अमेरिकी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के अनुसार, डीईजी गुर्दे को नुकसान पहुंचाने वाला खतरनाक तत्व है, जो मौखिक सिरपों में छिपकर बच्चों की जान ले सकता है। प्रभावित गांवों के पानी के नमूनों की जांच में कोई संक्रमण नहीं मिला, जिससे संदेह दवाओं पर ही केंद्रित हो गया।

इस हृदयविदारक घटना के बाद प्रशासन ने तत्काल कदम उठाए। जिला कलेक्टर शीलेंद्र सिंह ने कोल्डरिफ व नेक्सट्रो-डीएस सिरप की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया और डॉक्टरों, फार्मेसियों व अभिभावकों के लिए सलाह जारी की। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) को सूचित किया गया, जबकि भोपाल से स्वास्थ्य विभाग की दो सदस्यीय टीम ने प्रभावित इलाकों में घर-घर जाकर सर्वेक्षण शुरू कर दिया। परिवारों से बातचीत के दौरान दवाओं के नमूने एकत्र किए गए, जो पुणे के वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट भेजे जा चुके हैं। रक्त नमूनों की भी जांच चल रही है। इसके अलावा, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) व राज्य औषधि नियंत्रकों ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है, खासकर मध्य प्रदेश व राजस्थान में इसी तरह की घटनाओं के मद्देनजर।

जिला मुख्य चिकित्सा व स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नरेश गुन्नाड़े ने बताया कि यह वायरल संक्रमण का संवेदनशील समय है, लेकिन इतने बच्चों में अचानक गुर्दे की विफलता सामान्य नहीं है। यह किसी गंभीर खतरे का संकेत है। कलेक्टर सिंह ने कहा कि सिरप में डीईजी की मौजूदगी से ही ये मौतें हुईं लगती हैं। वर्तमान में सात अन्य बच्चे इलाजरत हैं—तीन छिंदवाड़ा में व चार नागपुर में—और उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है। जरूरत पड़ने पर पीएम श्री एयर एंबुलेंस सेवा से मरीजों को एयरलिफ्ट करने की व्यवस्था की गई है।

पीड़ित परिवार दुखी व गुस्से में हैं। वे न्याय व सच्चाई की मांग कर रहे हैं, तथा प्रशासन पर दबाव बना रहे हैं कि ऐसी दवाओं की गुणवत्ता जांच सख्त हो। यह घटना न केवल स्थानीय स्तर पर चिंता बढ़ा रही है, बल्कि पूरे देश में दवाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने पर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी न दोहराए।