Report by: Avinash Srivastva
Sasaram : बिहार के रोहतास जिले के मुख्यालय सासाराम में आज महान मौर्य सम्राट अशोक की जयंती अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। इस गौरवशाली अवसर पर पूरा शहर ‘देवानांप्रिय’ अशोक के जयकारों से गूंज उठा। आयोजन का मुख्य आकर्षण शहर में निकाली गई एक विशाल शोभायात्रा और धर्मशाला मोड़ पर स्थापित सम्राट अशोक की नवनिर्मित प्रतिमा का भव्य अनावरण रहा। इस कार्यक्रम ने सासाराम की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।

बेदा सूर्य मंदिर से धर्मशाला मोड़ तक उमड़ा जनसैलाब
Sasaram जयंती समारोह की शुरुआत बेदा सूर्य मंदिर से हुई, जहाँ से एक भव्य शोभायात्रा रवाना की गई। इस यात्रा में हजारों की संख्या में अनुयायी, युवा और स्थानीय नागरिक शामिल हुए। पारम्परिक वाद्य यंत्रों और गगनभेदी नारों के बीच यह शोभायात्रा शहर के मुख्य मार्गों से होकर गुजरी।

पूरे रास्ते में जगह-जगह स्थानीय निवासियों और व्यापारियों द्वारा पुष्प वर्षा कर यात्रा का स्वागत किया गया। इस दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे और स्वयंसेवकों की टोली व्यवस्था संभालने में जुटी रही। शोभायात्रा का समापन धर्मशाला मोड़ पर हुआ, जहाँ सासाराम की मेयर काजल कुमारी ने विधिवत मंत्रोच्चार और रिबन काटकर सम्राट अशोक की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया। मेयर ने इस अवसर पर कहा कि यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को न्याय और साहस की प्रेरणा देती रहेगी।
उपेंद्र कुशवाहा का संबोधन: “अशोक के आदर्श आज भी विश्व के लिए पथप्रदर्शक”
Sasaram इस ऐतिहासिक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा भी शामिल हुए। उन्होंने न केवल शोभायात्रा में शिरकत की, बल्कि जनसभा को संबोधित करते हुए सम्राट अशोक के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला।
कुशवाहा ने अपने संबोधन में कहा कि सम्राट अशोक केवल भारत के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व इतिहास के सबसे महान और मानवीय शासकों में से एक थे। उन्होंने युवाओं को याद दिलाया कि कैसे कलिंग युद्ध के रक्तपात के बाद अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने ‘युद्ध घोष’ को ‘धम्म घोष’ में बदल दिया। कुशवाहा ने जोर देकर कहा कि आज के दौर में जब दुनिया संघर्षों से जूझ रही है, तब अशोक का शांति, करुणा और अहिंसा का संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक है।
विरासत और विकास: अखंड भारत के निर्माता को नमन
Sasaram कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने सम्राट अशोक के प्रशासनिक कौशल और उनके द्वारा किए गए जनकल्याणकारी कार्यों की चर्चा की। वक्ताओं ने बताया कि किस तरह अशोक ने सड़कों, चिकित्सालयों और शिलालेखों के माध्यम से एक सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी थी। उनके शासनकाल में कला और वास्तुकला ने जो ऊंचाइयां छुईं, उसका प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ आज हमारा राष्ट्रीय चिह्न है।
कार्यक्रम की मुख्य झलकियां:
- सामाजिक सहभागिता: विभिन्न संगठनों, जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस उत्सव में भाग लिया।
- सांस्कृतिक संदेश: युवाओं से अपील की गई कि वे सम्राट अशोक के ‘धम्म’ यानी नैतिक आचरण के मार्ग को अपनाकर समाज में समानता और भाईचारा स्थापित करें।
- समापन: समारोह का समापन राष्ट्रगान और प्रतिमा पर सामूहिक पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुआ।
देर शाम तक सासाराम का माहौल पूरी तरह उत्सवमय बना रहा और लोगों ने दीप जलाकर अखंड भारत के निर्माता को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
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