Jitiya VratJitiya Vrat
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By: Ravindra Singh

Jitiya Vrat : संतान की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना के लिए आज, 3 अक्टूबर 2026 को माताएं जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत रख रही हैं। हिंदू धर्म में इस व्रत को विशेष फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से जितिया का उपवास करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें सुखमय जीवन का आशीर्वाद मिलता है।

यह पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है, दूसरे दिन माताएं निर्जला व्रत रखती हैं और तीसरे दिन शुभ समय में पारण करके उपवास पूरा करती हैं। इस व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा, व्रत कथा का श्रवण और जितिया धागे को धारण करने का विशेष महत्व है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत में प्रदोष काल की पूजा का विशेष स्थान है। आइए जानते हैं इस वर्ष जितिया व्रत का शुभ समय, प्रदोष काल में पूजा का महत्व और जितिया धागे से जुड़ी परंपराएं।

जितिया व्रत 2026: प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त

Jitiya Vrat जितिया व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस साल अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर 2026 को सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर शुरू हुई है और इसका समापन 4 अक्टूबर को सुबह 5 बजकर 41 मिनट पर होगा।

जितिया व्रत के दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा के लिए प्रदोष काल को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान माताएं संतान की लंबी आयु और कल्याण की प्रार्थना करती हैं।

  • व्रत की तिथि: 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
  • अष्टमी तिथि प्रारंभ: 3 अक्टूबर, सुबह 7:59 बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त: 4 अक्टूबर, सुबह 5:41 बजे
  • प्रदोष काल: शाम 6:05 बजे से रात 8:29 बजे तक

जितिया व्रत में प्रदोष काल की पूजा क्यों है खास?

Jitiya Vrat जीवित्पुत्रिका व्रत में प्रदोष काल को पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि इस समय भगवान जीमूतवाहन की आराधना करने से संतान को सुख, समृद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह स्नान के बाद उपवास का संकल्प लेती हैं। दिनभर निर्जला रहकर संतान की मंगलकामना करती हैं। शाम को प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा, आरती और व्रत कथा का पाठ किया जाता है।

इस अवसर पर चील और सियारिन की कथा सुनने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कथा के श्रवण से व्रत का महत्व पूर्ण होता है। पूजा के दौरान माताएं अपने परिवार और संतान की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करती हैं।

जितिया धागे का क्या है धार्मिक महत्व?

Jitiya Vrat जितिया व्रत में लाल रंग के धागे का विशेष स्थान है। इसे जितिया धागा कहा जाता है और संतान की सुरक्षा तथा लंबी उम्र की कामना से जुड़ा माना जाता है। पूजा के दौरान यह धागा चील और सियारिन को अर्पित किया जाता है।

Jitiya Vrat 2025: जितिया व्रत में महिलाएं क्यों पहनती हैं जिउतिया धागा? जानें इसका महत्व | Why women wear Jeutiya thread in Jitiya Vrat 2025 Know Jitiya thread significance

परंपरा के अनुसार, माताएं अपनी संतानों की संख्या के बराबर जितिया धागे चढ़ाती हैं। अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार कुछ महिलाएं इसमें सोने या चांदी का लॉकेट भी लगवाती हैं।

पूजा पूरी होने के बाद माताएं इस धागे को अपने गले में धारण करती हैं। धार्मिक आस्था के अनुसार, इसे संतान के जीवन में सुख, सुरक्षा और मंगल का प्रतीक माना जाता है। लोक मान्यताओं में यह विश्वास भी प्रचलित है कि जितिया धागा संतान को दुर्घटनाओं, शारीरिक कष्टों और नकारात्मक प्रभावों से बचाने में सहायक होता है।

जितिया व्रत में इन परंपराओं का रखें ध्यान

  • व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • भगवान जीमूतवाहन का स्मरण करते हुए निर्जला व्रत का संकल्प लें।
  • प्रदोष काल में विधि-विधान से पूजा और आरती करें।
  • चील और सियारिन की व्रत कथा का श्रवण अवश्य करें।
  • पूजा में जितिया धागा अर्पित करके उसे श्रद्धापूर्वक धारण करें।
  • अगले दिन निर्धारित परंपरा और शुभ समय के अनुसार व्रत का पारण करें।

धार्मिक मान्यता: जितिया व्रत मातृत्व, संतान के प्रति प्रेम और परिवार की खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घायु के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं।

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और लोक आस्थाओं पर आधारित हैं। इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी इन मान्यताओं की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है।

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