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BY: Yoganand Shrivastva

नई दिल्ली: पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान हुए ताजा हादसे ने एक बार फिर पूरे देश को हिला कर रख दिया है। रथ के दर्शन और उसे छूने की होड़ में भगदड़ मच गई, और श्रद्धा का यह पर्व अचानक त्रासदी में तब्दील हो गया

लेकिन सवाल ये है कि क्या ये पहली बार हुआ है? बिल्कुल नहीं!
भारत में भक्ति और जनसैलाब की टकराहट की ये कोई नई कहानी नहीं, बल्कि हर साल दोहराया जाने वाला खौफनाक चैप्टर बनता जा रहा है, जहां ‘आस्था’ की भीड़ और ‘व्यवस्था’ की लापरवाही मिलकर तबाही का तांडव रचती हैं।


पुरी की भगदड़: जहां आस्था हारी और अव्यवस्था जीती

आज पुरी की पवित्र धरती पर आयोजित विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा में हजारों श्रद्धालु उमड़े। लेकिन भीड़ नियंत्रण के इंतजाम इतने ढीले थे कि श्रद्धा के जोश में बेकाबू भीड़ संकरे रास्तों में फंस गई। परिणाम? भगदड़, चीख-पुकार और घायल होते भक्तों का मंजर।


प्रयागराज का कुंभ: पुण्य की डुबकी बनी मौत की छलांग

साल की शुरुआत में ही 29 जनवरी को प्रयागराज में कुंभ मेले में स्नान के दौरान संकरी गलियों और खराब प्रबंधन ने कई जानें लील लीं। लाखों की भीड़ उमड़ी लेकिन सुरक्षा इंतजाम आधे भी नहीं थे। नतीजा – आस्था फिर से बेबस हो गई।


तिरुमाला मंदिर: टोकन बना ताबूत!

8 जनवरी 2025 को आंध्र प्रदेश के तिरुपति के तिरुमाला मंदिर में एकादशी दर्शन के लिए टोकन वितरण के समय मची भगदड़ में 6 लोगों की जान चली गई, 40 से ज्यादा घायल हुए।
कुछ टोकन, बहुत से श्रद्धालु और जीरो प्लानिंग – यही बना मौत का कारण।


जहानाबाद: मेला बना मातम

11 अगस्त 2024 को बिहार के जहानाबाद जिले के एक धार्मिक मेले में भी वैसा ही हुआ।
संकरे रास्ते, बिना इमरजेंसी एक्जिट और हजारों लोगों का जमा होना – ये कॉम्बिनेशन किसी बम से कम नहीं, जिसका विस्फोट मौत के रूप में हुआ।


हाथरस: जब सत्संग ने छीन ली 121 जिंदगियां

सबसे दिल दहला देने वाला हादसा 2 जुलाई 2024 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुआ, जब एक सत्संग के दौरान भगदड़ मची और 121 लोगों की मौत हो गई, जिनमें ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे थे।
अनुमति थी 80,000 की, भीड़ आई 2.5 लाख – अब बताइए, क्या ये मौत को बुलावा नहीं था?


इंदौर का मंदिर हादसा: आस्था का मंच ध्वस्त

31 मार्च 2023 को मध्यप्रदेश के इंदौर में बेलेश्वर महादेव मंदिर में नवरात्रि पर एक संकरे मंच के गिरने से भगदड़ मच गई और कई लोग घायल हुए। श्रद्धा, व्यवस्था और लोहे के एंगल – तीनों ही टूट गए।


क्या हैं ये हादसे बताने वाले संकेत?

हर बार कारण एक ही –

  • भीड़ का गलत अनुमान
  • नाकाफी पुलिस बल और प्रशासनिक तालमेल की कमी
  • मेडिकल इमरजेंसी और निकास द्वारों की गैरमौजूदगी
  • और सबसे बड़ी बात – प्रबंधन की मानसिकता की चूक, जहां ‘जितनी बड़ी भीड़, उतना बड़ा आयोजन’ मान लिया जाता है, पर सुरक्षा की प्लानिंग कहीं खो जाती है।

अब नहीं जागे तो कब?

पुरी की घटना कोई अलग त्रासदी नहीं, बल्कि चेतावनी है – भक्ति के इस महासंग्राम को संभालिए वरना ये मौत का रण बन जाएगा
सरकार, आयोजक और आम जनता – सबकी साझी जिम्मेदारी है कि श्रद्धा का ये पर्व, व्यवस्था की कब्र न बन जाए।

भक्तों की भीड़ हो या रथ का रेला – अगर सुरक्षा नहीं, तो आस्था भी खतरे में है!