रिपोर्टर: योगेन्द्र सिंह
Chhattisgarh : छत्तीसगढ़ के खेल विभाग में खेल सामग्रियों की खरीद और विभिन्न सेवाओं के भुगतानों को लेकर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि विभाग ने टेंडर प्रक्रिया की अनिवार्यता से बचने के लिए कई सामानों की खरीद को टुकड़ों में बांटकर अलग-अलग बिल जारी किए। जूडो, खो-खो और कबड्डी मैट से लेकर महंगे वेटलिफ्टिंग उपकरणों और हॉकी टर्फ की सफाई तक में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है।
टेंडर के नियमों से बचने के लिए एक ही दिन में बनाए गए कई बिल
आरटीआई एक्टिविस्ट द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, 30 अगस्त 2024 को खेल विभाग ने खेल सामग्रियों की खरीद के लिए एक ही दिन में पांच अलग-अलग बिल जारी किए। इन सभी बिलों की राशि 3 लाख रुपए से कम रखी गई थी, ताकि ई-टेंडर या सार्वजनिक निविदा की अनिवार्यता से बचा जा सके। जूडो मैट, खो-खो मैट और कबड्डी मैट की अलग-अलग खरीद दिखाकर कुल 14.85 लाख रुपए के बिल बनाए गए। नियमों के जानकारों का कहना है कि एक ही जरूरत के सामान को इस तरह टुकड़ों में खरीदना सीधे तौर पर टेंडर प्रक्रिया को दरकिनार करने की साजिश को दर्शाता है।
बिना टेंडर 15 लाख की सफाई और डेढ़ करोड़ के बड़े भुगतान पर सवाल
खेल सामग्री के अलावा सर्विस और मेंटेनेंस के नाम पर किए गए भुगतानों ने भी विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। दस्तावेजों के अनुसार, रायपुर, बिलासपुर और राजनांदगांव के हॉकी टर्फ की केवल तीन महीने की सफाई के लिए 15 लाख 4 हजार रुपए से अधिक का भुगतान किया गया। इसके अलावा, मार्च 2025 में दो अलग-अलग बिलों के जरिए 1 करोड़ 49 लाख रुपए से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च की गई, जिसके समर्थन में टेंडर या कोटेशन से जुड़े जरूरी दस्तावेज गायब हैं।
वेटलिफ्टिंग उपकरणों की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर गंभीर संकट
विभाग द्वारा अक्टूबर 2024 में लगभग 30 लाख रुपए की लागत से खरीदे गए वेटलिफ्टिंग उपकरणों की खरीद प्रक्रिया भी संदेह के घेरे में है। खिलाड़ियों की सुरक्षा से जुड़े इन भारी भरकम उपकरणों (बारबेल, प्लेट, बेंच आदि) के लिए तय मानकों और निविदा नियमों का पालन किए जाने के कोई पुख्ता रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। जानकारों का मानना है कि यदि इस तरह के उपकरणों की गुणवत्ता से समझौता किया जाता है, तो अभ्यास के दौरान खिलाड़ियों की जान को भी खतरा हो सकता है। फिलहाल, इन तमाम मामलों में पारदर्शी जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय करने की मांग जोर पकड़ रही है।
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