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रिपोर्टर: दीनानाथ माऔर

Aurangabad : बिहार के औरंगाबाद जिले का नवीनगर प्रखंड स्थित माता गजना शक्तिपीठ अपनी अनूठी मान्यताओं और रहस्यों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस धाम की ख्याति दूर-दूर तक फैली है, जहां बिना किसी मूर्ति या पिंड के केवल मंदिर में चुनरी और झूमर चढ़ाए जाते हैं। हालांकि, हाल ही में यहां आयोजित होने वाले सरकारी महोत्सव के स्वरूप को लेकर धाम के महंत और पुजारियों ने तीखी आपत्ति जताई है, जिससे यह मामला सुर्खियों में आ गया है।

क्या है गजना धाम का पौराणिक इतिहास और अनोखी मान्यता?

Aurangabad माता गजना शक्तिपीठ का वर्णन ‘देवी भागवत पुराण’ में भी मिलता है। मान्यता है कि यह पावन भूमि महर्षि पुलस्त्य ऋषि की तपोस्थली रही है। किंवदंतियों के अनुसार, जब यहां पानी का संकट गहराया था, तब महर्षि पुलस्त्य की आराधना पर माता ने ‘गज’ (हाथी) का रूप धारण कर नदी का रुख इस आश्रम की ओर मोड़ दिया था और यहीं स्थायी रूप से विराजमान हो गईं। आज भी यहां माता को सवा सेर आटा और पाव भर घी से बनी रोटियों का खास भोग लगाया जाता है, जो आने वाले सभी भक्तों के बीच कभी कम नहीं पड़ता।

शाही परिवार से जुड़ी है पूजा की सदियों पुरानी परंपरा

Aurangabad पुजारी रामानंद पंडित के अनुसार, इस क्षेत्र के राजा इंद्रदेव नारायण सिंह द्वारा माता की नियमित पूजा-अर्चना की जाती थी। ऐसी मान्यता है कि माता के आशीर्वाद से ही उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी, जिनका नाम भगवती नारायण रखा गया। तब से लेकर आज तक, माता रानी को रोजाना लगने वाला भोग उसी परिवार के वंशजों द्वारा अर्पित किया जाता है, जो इस पीठ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को और मजबूत करता है।

सरकारी महोत्सव में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर अशुद्धता का आरोप

Aurangabad गजना धाम के महंत ने हालिया प्रशासनिक महोत्सव के आयोजन पर कड़ा एतराज जताया है। उनका कहना है कि पहले यहां नौ दिवसीय महोत्सव होता था, जो घटकर अब दो दिन का रह गया है। इसके अलावा, पहले जहां केवल धार्मिक चर्चाएं और माता का गुणगान होता था, वहीं अब सरकारी कार्यक्रमों के तहत होने वाले नृत्य-संगीत और कथित तौर पर अश्लील प्रस्तुतियों से इस पवित्र स्थल की गरिमा को ठेस पहुंच रही है। महंत ने मांग की है कि इस पावन धाम की मर्यादा के अनुकूल ही केवल धार्मिक संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

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