by-Ravindra Sikarwar
भारतीय न्यायिक व्यवस्था में डिजिटल संपत्तियों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला आया है। तमिलनाडु की मद्रास उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि क्रिप्टोकरेंसी भारतीय कानून के अंतर्गत ‘संपत्ति’ की श्रेणी में आती है। यह फैसला न केवल निवेशकों के अधिकारों को मजबूत करेगा, बल्कि क्रिप्टो विवादों में अदालतों की भूमिका को भी परिभाषित करेगा। न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश की एकलपीठ ने 25 अक्टूबर 2025 को यह निर्णय सुनाया, जिसमें कहा गया कि भले ही क्रिप्टोकरेंसी भौतिक रूप से अस्तित्व न रखती हो या मुद्रा का दर्जा न पाती हो, फिर भी यह एक ऐसी संपत्ति है जो स्वामित्व, हस्तांतरण और ट्रस्ट में रखने योग्य है।
मामले का पृष्ठभूमि: साइबर हमले से फंसे निवेशक के अधिकार
यह फैसला एक क्रिप्टो निवेशक, रुतुकुमारी द्वारा दायर याचिका पर आया है। याचिकाकर्ता ने जनवरी 2024 में वजिरएक्स प्लेटफॉर्म पर 3,532.30 एक्सआरपी (XRP) सिक्के खरीदे थे, जिनकी कीमत लगभग 1.98 लाख रुपये थी। ये सिक्के उनके पोर्टफोलियो खाते से जुड़े थे, जो ईमेल और मोबाइल नंबर से लिंक्ड था। जुलाई 2024 में वजिरएक्स पर एक बड़े साइबर हमले के बाद प्लेटफॉर्म ने सभी खातों को फ्रीज कर दिया। हमले में मुख्य रूप से ईआरसी-20 टोकन चोरी हुए थे, लेकिन याचिकाकर्ता के एक्सआरपी सिक्के इससे अलग थे।
वजिरएक्स के सिंगापुर स्थित मूल कंपनी, जेट्टाई प्राइवेट लिमिटेड ने हमले के बाद पुनर्गठन प्रक्रिया शुरू की, जिसमें सिंगापुर हाईकोर्ट ने उपयोगकर्ताओं से प्रो-राटा नुकसान साझा करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उनके एसेट्स को जबरन प्रभावित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे व्यक्तिगत संपत्ति हैं। उन्होंने आर्बिट्रेशन एंड कंसीलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 9 के तहत अंतरिम सुरक्षा की मांग की, ताकि वजिरएक्स उनके होल्डिंग्स को छेड़े या पुनर्वितरित न कर सके।
न्यायालय ने पाया कि लेन-देन चेन्नई से शुरू हुआ था और भारतीय बैंक खाते का उपयोग किया गया था, इसलिए मामला मद्रास हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार में आता है। वजिरएक्स का भारतीय इकाई, जन्माई लैब्स, फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (एफआईयू) के साथ पंजीकृत है और भारत में क्रिप्टो हैंडलिंग की अनुमति रखता है, जबकि सिंगापुर की मूल कंपनी या बिनेंस जैसी अंतरराष्ट्रीय इकाइयां भारत में रजिस्टर्ड नहीं हैं। कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी कर याचिकाकर्ता के होल्डिंग्स को सुरक्षित रखा, जब तक आर्बिट्रेशन प्रक्रिया पूरी न हो।
न्यायालय के प्रमुख अवलोकन: क्रिप्टो को संपत्ति क्यों माना गया?
न्यायमूर्ति वेंकटेश ने विस्तार से तर्क दिया कि क्रिप्टोकरेंसी ‘1 और 0 की धारा’ मात्र नहीं है, जो ब्लॉकचेन पर संग्रहीत होती है। यह एक पहचान योग्य, हस्तांतरणीय और निजी कुंजी (प्राइवेट की) के माध्यम से पूर्ण नियंत्रण वाली संपत्ति है। कोर्ट ने कहा, “क्रिप्टोकरेंसी सख्त अर्थ में मुद्रा नहीं है, न ही डिजिटल एसेट को सख्ती से संपत्ति कहा जा सकता है, लेकिन यह संपत्ति है जो लाभकारी रूप में आनंद ली जा सकती है, कब्जे में रखी जा सकती है और ट्रस्ट में धारित की जा सकती है।”
- भारतीय कानून के संदर्भ: कोर्ट ने इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 2(47A) का हवाला दिया, जो क्रिप्टो को ‘वर्चुअल डिजिटल एसेट’ (वीडीए) के रूप में वर्गीकृत करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि क्रिप्टो सट्टा लेन-देन नहीं माना जाता, बल्कि एक वैध संपत्ति है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों जैसे अहमद जीएच अरिफ बनाम सीडब्ल्यूटी (1970) और जिलूभाई नानभाई खचार बनाम गुजरात राज्य (1995) का सहारा लेते हुए ‘संपत्ति’ की परिभाषा को विस्तार दिया गया, जिसमें अमूर्त संपत्तियां भी शामिल हैं।
- अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: कोर्ट ने विदेशी फैसलों से प्रेरणा ली। न्यूजीलैंड हाईकोर्ट के रस्को बनाम क्रिप्टोपिया लिमिटेड (2020) में क्रिप्टो को ‘अमूर्त संपत्ति’ माना गया, जो ट्रस्ट में रखी जा सकती है। इसी तरह, यूके हाईकोर्ट के एए बनाम अज्ञात व्यक्ति (2019) और सिंगापुर हाईकोर्ट के बायबिट फिनटेक बनाम … मामलों का उल्लेख किया गया, जहां डिजिटल एसेट्स को कानूनी संरक्षण दिया गया।
- निगरानी और सुझाव: न्यायालय ने वेब3 और क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स को अन्य व्यवसायों की तरह कॉर्पोरेट गवर्नेंस मानकों का पालन करने की सलाह दी। इसमें क्लाइंट फंड्स का अलग रखना, स्वतंत्र ऑडिट, मजबूत केवाईसी (नो योर कस्टमर) और एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग जांच शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि भारत के पास मौका है कि वह नवाचार को बढ़ावा देते हुए उपभोक्ता संरक्षण और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने वाला नियामक ढांचा तैयार करे। विदेशी दिवालियापन या पुनर्गठन योजनाएं भारतीय उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत अधिकारों को ओवरराइड नहीं कर सकतीं।
प्रभाव: निवेशकों और बाजार के लिए क्या अर्थ?
यह फैसला क्रिप्टो क्षेत्र में एक मील का पत्थर है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे निवेशक भारतीय अदालतों में आसानी से दावा दायर कर सकेंगे, खासकर वजिरएक्स जैसे मामलों में। टेक्नोलॉजी वकील रश्मि देशपांडे ने कहा कि यह निर्णय सिंगापुर और भारत दोनों अदालतों में निवेशकों को नई उम्मीद देता है। कराधान, उत्तराधिकार, दिवालियापन और अनुबंध प्रवर्तन जैसे क्षेत्रों में स्पष्टता आएगी।
क्रिप्टो उद्योग में उत्साह है, लेकिन चेतावनी भी। यह फैसला दिखाता है कि अदालतें डिजिटल अर्थव्यवस्था में अधिकारों, जिम्मेदारियों और विश्वास को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। हालांकि, पूर्ण नियमन की कमी बनी हुई है, जिससे बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी। निवेशकों को सलाह है कि वे रजिस्टर्ड प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करें और जोखिमों से अवगत रहें।
डिजिटल भविष्य के लिए न्यायिक मार्गदर्शन:
मद्रास हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय कानून को आधुनिक डिजिटल वास्तविकताओं से जोड़ता है। यह न केवल एक निवेशक की रक्षा करता है, बल्कि पूरे क्रिप्टो इकोसिस्टम को कानूनी वैधता प्रदान करता है। भविष्य में ऐसे फैसलों से भारत वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थिति बना सकता है, जहां नवाचार और सुरक्षा साथ-साथ चलें।
