by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के 80वें सत्र की मेजबानी में न्यूयॉर्क पहुंचे विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ द्विपक्षीय बैठक की। यह बैठक दोनों देशों के बीच हाल के व्यापारिक तनावों के बीच हुई, जिसमें अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत शुल्क लगाना और एच-1बी वीजा आवेदनों पर 100,000 डॉलर की नई फीस थोपना शामिल है। लगभग एक घंटे चली इस बैठक में दोनों नेताओं ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। रुबियो ने भारत को “महत्वपूर्ण साझेदार” बताते हुए कहा कि यह संबंध दोनों देशों की समृद्धि के लिए आवश्यक है, लेकिन भारतीय आईटी पेशेवरों पर नौकरी प्रभाव की चिंताएं बरकरार हैं।
यह बैठक 22 सितंबर को न्यूयॉर्क के लोटे न्यूयॉर्क पैलेस होटल में आयोजित हुई, जहां जयशंकर और रुबियो ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर रुबियो ने पोस्ट किया, “यूएनजीए में भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से मुलाकात हुई। हमने द्विपक्षीय संबंधों के प्रमुख क्षेत्रों जैसे व्यापार, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स और महत्वपूर्ण खनिजों पर चर्चा की, जो भारत और अमेरिका दोनों के लिए समृद्धि उत्पन्न करेंगे।” जयशंकर ने भी एक्स पर लिखा, “न्यूयॉर्क में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से अच्छी बैठक हुई। हमारी बातचीत में द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की एक श्रृंखला शामिल थी। प्राथमिक क्षेत्रों में प्रगति के लिए निरंतर संलग्नता की महत्वपूर्णता पर सहमत हुए। हम संपर्क में रहेंगे।” यह पहली आमने-सामने की बैठक थी, जबसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर नई व्यापारिक प्रतिबंध लगाए हैं।
अमेरिकी शुल्कों का मुद्दा बैठक का केंद्रीय बिंदु रहा। अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन ने भारत की रूसी तेल खरीद को यूक्रेन युद्ध में मॉस्को को अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय सहायता देने का आरोप लगाते हुए भारतीय आयात पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लगाया, जिससे कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया। इससे पहले जुलाई में 25 प्रतिशत का बेसलाइन शुल्क लगाया गया था। यह कदम भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजार अमेरिका को प्रभावित कर सकता है, जहां 2024 में भारत से 87 अरब डॉलर का निर्यात हुआ था। प्रभावित क्षेत्रों में वस्त्र, आभूषण, जूते, समुद्री भोजन, चमड़ा और रसायन शामिल हैं, जिनसे निर्यात में 43 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। कुछ क्षेत्र जैसे फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और पेट्रोलियम उत्पादों को छूट मिली है, जबकि स्टील, एल्यूमीनियम और तांबे पर 25 प्रतिशत शुल्क बना रहेगा। भारतीय निर्यात संगठनों ने सरकार से ऋण चुकौती पर एक वर्ष का मोरेटोरियम और बाजार विविधीकरण के लिए सहायता की मांग की है।
एच-1बी वीजा फीस में वृद्धि ने भी संबंधों में दरार डाली है। 19 सितंबर को ट्रंप ने “कुछ गैर-आप्रवासी श्रमिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध” नामक घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जिसमें एच-1बी आवेदनों पर प्रति वर्ष 100,000 डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) की फीस लगाई गई। यह फीस 21 सितंबर से प्रभावी हुई और वर्तमान वीजा धारकों पर लागू नहीं होती, लेकिन नई आवेदनों के लिए है। एच-1बी वीजा उच्च कुशल विदेशी श्रमिकों (जैसे इंजीनियर, वैज्ञानिक) के लिए है, जो लॉटरी सिस्टम से 85,000 प्रति वर्ष दिए जाते हैं। भारत इसका सबसे बड़ा लाभार्थी है, जहां 71 प्रतिशत वीजा भारतीयों को मिलते हैं। 2025 की पहली छमाही में अमेज़न को 12,000 से अधिक, जबकि माइक्रोसॉफ्ट और मेटा को 5,000 से अधिक एच-1बी वीजा मिले। यह फीस वर्तमान 2,000-5,000 डॉलर से 60 गुना अधिक है, जो स्टार्टअप्स, छोटे व्यवसायों और आईटी क्षेत्र को प्रभावित करेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि प्रभावित हो सकती है, क्योंकि टेक कंपनियां वैश्विक प्रतिभाओं पर निर्भर हैं। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि यह फीस नई याचिकाओं पर लागू है और मौजूदा धारकों की यात्रा पर असर नहीं डालेगी।
बावजूद इन चुनौतियों के, बैठक सकारात्मक रही। दोनों पक्षों ने प्राथमिक क्षेत्रों में प्रगति के लिए निरंतर संवाद पर जोर दिया। जयशंकर ने यूएनजीए में 27 सितंबर को भारत का राष्ट्रीय बयान दिया। यह बैठक भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है, जो चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ दोनों देशों की साझा चिंताओं पर आधारित है। हालांकि, व्यापारिक असंतुलन (भारत का अमेरिकी आयात पर 6.2 प्रतिशत औसत शुल्क बनाम अमेरिका का 2.4 प्रतिशत) और रूसी तेल खरीद जैसे मुद्दे अनसुलझे हैं। भारतीय सरकार ने घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने और यूके के साथ मुक्त व्यापार समझौते जैसे कदम उठाए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक तनावों को कम करने की दिशा में सकारात्मक है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए व्यापार वार्ताओं को तेज करना होगा। भारतीय आईटी कंपनियां, जैसे टीसीएस और इंफोसिस, जो अमेरिका में हजारों कर्मचारियों पर निर्भर हैं, इस फीस से चिंतित हैं। अमेरिकी टेक दिग्गजों ने भी चेतावनी दी है कि इससे नवाचार प्रभावित हो सकता है। कुल मिलाकर, जयशंकर-रुबियो मुलाकात ने उम्मीद जगाई है कि दोनों देश इन चुनौतियों का समाधान निकालेंगे।
