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by-Ravindra Sikarwar

व्यभिचार, एक विवाहित व्यक्ति और किसी ऐसे व्यक्ति के बीच यौन संबंध बनाना है जिससे उसकी शादी नहीं हुई है। यह विवाह के प्रति वफादारी के उल्लंघन का प्रतिनिधित्व करता है और इसे कई समाजों में अनैतिक माना जाता है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (मई 2025) और कर्नाटक उच्च न्यायालय (अक्टूबर 2023) के हालिया फैसलों ने भी इस बात की पुष्टि की है। इन फैसलों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) का हवाला दिया गया है।

कानूनी आधार और अदालती फैसले:
CrPC की धारा 125(4): यह भारतीय कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि एक पत्नी जो व्यभिचार (adultery) में जीवन बिता रही है, वह अपने पति से भरण-पोषण (maintenance) पाने की हकदार नहीं है।

तलाकनामा (Divorce Decree) सबूत के तौर पर: विभिन्न अदालतों ने यह फैसला सुनाया है कि अगर किसी महिला का तलाक व्यभिचार के आधार पर हुआ है, तो वह तलाकनामा ही इस बात का पुख्ता सबूत माना जाएगा कि पत्नी व्यभिचार में शामिल थी। इसका मतलब है कि तलाक के बाद भी पत्नी भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।

महत्वपूर्ण अदालती फैसले:

  • छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (मई 2025): इस न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जिस महिला का तलाक व्यभिचार के आधार पर हुआ है, वह CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है।
  • कर्नाटक उच्च न्यायालय (अक्टूबर 2023): इस न्यायालय ने भी इसी तरह का फैसला दिया। कोर्ट ने CrPC की धारा 125(4) का उल्लेख करते हुए कहा कि तलाकनामा ही व्यभिचार का पर्याप्त प्रमाण है।

मुख्य निष्कर्ष:
इन फैसलों का सार यह है कि अगर कोई पत्नी व्यभिचार में लिप्त पाई जाती है, तो वह कानूनी तौर पर अपने पति से भरण-पोषण पाने के अयोग्य हो जाती है। व्यभिचार के आधार पर दिया गया तलाक इस अयोग्यता की पुष्टि करता है। यह कानून महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकार को कुछ विशेष परिस्थितियों में सीमित करता है, जहाँ वे वैवाहिक संबंधों की पवित्रता का उल्लंघन करती हैं।

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