by-Ravindra Sikarwar
जबलपुर, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े एक मामले में एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि एक बालिग महिला को उसकी मर्जी के बिना किसी शादीशुदा व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने से नहीं रोका जा सकता। यह फैसला लिव-इन संबंधों के कानूनी पहलुओं को लेकर एक नई दिशा देगा।
मामले का विवरण:
यह मामला एक याचिका से जुड़ा था, जिसमें एक महिला के परिवार ने उसकी लिव-इन रिलेशनशिप पर आपत्ति जताई थी। परिवार ने आरोप लगाया था कि उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर एक शादीशुदा व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर किया गया है। याचिका में कोर्ट से महिला को उसके परिवार के पास वापस भेजने की मांग की गई थी।
इस मामले की सुनवाई के दौरान, महिला ने खुद हाई कोर्ट में पेश होकर यह स्पष्ट किया कि वह अपनी मर्जी से और बिना किसी दबाव के उस व्यक्ति के साथ रह रही है। महिला ने यह भी बताया कि वह बालिग है और अपने फैसले खुद लेने में सक्षम है।
हाई कोर्ट का फैसला और कानूनी दृष्टिकोण:
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एम.एस. भट्टी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
- संविधान का अधिकार: भारतीय संविधान के तहत, हर बालिग नागरिक को अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार है, जिसमें अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार भी शामिल है।
- निजी पसंद का सम्मान: कोर्ट ने जोर देकर कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप एक व्यक्तिगत पसंद है और इसे कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है। जब तक कोई आपराधिक गतिविधि न हो, तब तक किसी भी बालिग व्यक्ति को इस तरह के संबंध में रहने से नहीं रोका जा सकता।
- शादीशुदा व्यक्ति के साथ संबंध: कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही पुरुष शादीशुदा हो, लेकिन अगर महिला बालिग है और अपनी मर्जी से उसके साथ रह रही है, तो कानून उसे जबरन अलग नहीं कर सकता।
यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर समाज में चल रही बहस और कानूनी जटिलताओं को कम करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
