रिपोर्टर: रविन्द्र सिंह
Gwalior : मध्य प्रदेश के ग्वालियर में AG ऑफिस परिसर स्थित दारुल कुरआन मदरसे से 26 बच्चों को मुक्त कराए जाने के बाद अब इस पूरे परिसर की कानूनी वैधता पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। लगभग 4,000 से 4,500 वर्गफीट की सरकारी भूमि पर बने मस्जिद और मदरसे के निर्माण को लेकर राजस्व विभाग ने जांच तेज कर दी है। प्रशासन मुख्य रूप से यह पता लगाने में जुटा है कि सरकारी जमीन के खसरा रिकॉर्ड में ‘मस्जिद नजूल’ की एंट्री किस आधार पर और किस अधिकारी के कार्यकाल में दर्ज की गई थी।
26 बच्चों के रेस्क्यू के बाद बढ़ा जांच का दायरा
Gwalior बाल अधिकार संरक्षण आयोग की टीम द्वारा मदरसे में की गई छापेमारी के बाद मामला केवल बच्चों के रेस्क्यू तक सीमित नहीं रहा है। मदरसे में कथित प्रताड़ना और विवादित पठन सामग्री मिलने के आरोपों के बाद अब निर्माण की कानूनी अनुमति और जमीन के मालिकाना हक की गहन पड़ताल की जा रही है। जांच की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ केंद्रीय व राज्य स्तर की टीमें भी जमीन और निर्माण से जुड़े पुराने दस्तावेजों को खंगालने में जुटी हुई हैं।
राजस्व रिकॉर्ड में ‘मस्जिद नजूल’ दर्ज होने पर उठे सवाल
Gwalior जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आखिर शासकीय दर्ज भूमि के खसरे के कॉलम नंबर 12 में ‘मस्जिद नजूल’ की प्रविष्टि कैसे और किन दस्तावेजों के आधार पर की गई। एसडीएम और राजस्व विभाग की टीम यह पता लगा रही है कि क्या इस निर्माण के लिए संबंधित विभागों से कोई आधिकारिक मंजूरी ली गई थी या नहीं। इसके साथ ही इस बात की भी समीक्षा की जा रही है कि निर्माण के दौरान उस समय के जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई की गई थी अथवा रिकॉर्ड में बाद में कोई हेरफेर हुआ था।
1970 के दशक का दावा और दस्तावेजों की प्रशासनिक पड़ताल
Gwalior मामले से जुड़ी चर्चाओं के अनुसार, वर्ष 1973 से 1977 के बीच नमाज अदा करने के उद्देश्य से लगभग 200 वर्गफीट की सीमित जगह दी गई थी, जिसका दायरा समय के साथ बढ़ता गया और बाद में वहां स्थाई निर्माण करा लिया गया। एसडीएम अतुल सिंह के अनुसार, राजस्व विभाग से जमीन आवंटन और स्वामित्व से जुड़े सभी मूल दस्तावेज तलब किए गए हैं। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि अभिलेखों की पूरी जांच के बाद ही जमीन के वैधानिक स्वरूप की स्थिति साफ होगी और तदनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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