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रिपोर्टर: रविन्‍द्र सिंह

Gwalior : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दाह संस्कार के दौरान मानव शरीर के पंचतत्व प्रकृति में विलीन हो जाते हैं, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लकड़ी, कपूर और घी के दहन से निकलने वाला धुआं वायु गुणवत्ता को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। इसमें मौजूद जहरीली गैसें और सूक्ष्म कण पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ाते हैं। इसी समस्या के समाधान के लिए मध्य प्रदेश का नगरीय प्रशासन एक अनूठा कदम उठाने जा रहा है। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत अब श्मशान घाटों में विशेष एयर प्यूरीफायर सिस्टम स्थापित किए जाएंगे।

ग्वालियर से शुरुआत, प्रयोग सफल होने पर पूरे MP में लागू होगी योजना

Gwalior स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में ग्वालियर राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़कर 30वें पायदान पर पहुंच गया है, जबकि इंदौर दूसरे, जबलपुर तीसरे और भोपाल चौथे स्थान पर काबिज हैं। शहर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) सुधारने के उद्देश्य से नगर निगम ग्वालियर सबसे पहले लक्ष्मीगंज और मुरार श्मशान घाट को मॉडल प्रोजेक्ट के रूप में चुनेगा। यदि यह नवाचार सफल रहता है, तो भोपाल, इंदौर, जबलपुर, उज्जैन और सागर समेत प्रदेश की अन्य नगर निगमों में भी इसे लागू किया जाएगा।

किचन चिमनी की तर्ज पर काम करेगा प्यूरीफायर सिस्टम

Gwalior श्मशान घाटों में प्रदूषण नियंत्रण की यह व्यवस्था आधुनिक चिमनी तकनीक पर आधारित होगी:

  • विशेष लोहे का ढांचा: दाह संस्कार के चबूतरे पर एक कवर्ड लोहे का स्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा।
  • सक्शन मोटर और फिल्टर: चिता से निकलने वाले धुएं को शक्तिशाली मोटरों के जरिए चिमनी के भीतर खींचा जाएगा।
  • एयर प्यूरीफायर की भूमिका: चिमनी में लगे प्यूरीफायर धुएं में मौजूद हानिकारक तत्वों और कालिमा को सोखकर केवल फिल्टर्ड एवं सुरक्षित हवा को बाहर छोड़ेंगे।

इस परियोजना के तहत दोनों श्मशानों के दो-दो चबूतरों पर कुल 4 सिस्टम लगाए जाएंगे। प्रति चबूतरा लगभग 8 लाख रुपये की लागत से कुल 32 लाख रुपये का बजट NCAP फंड से खर्च होगा।

चिता के धुएं से उत्सर्जित होने वाले खतरनाक तत्व और उनके जोखिम

Gwalior मानव देह और पूजा सामग्री के दहन के दौरान कई हानिकारक और जहरीली गैसें हवा में घुलती हैं:

  • कार्बन मोनोऑक्साइड व ग्रीनहाउस गैसें: अधजले जैविक पदार्थों से अत्यधिक विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड और वातावरण को गर्म करने वाली कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है।
  • नाइट्रोजन व सल्फर डाइऑक्साइड: ये गैसें श्वसन तंत्र को प्रभावित करती हैं और सांस की नली में जलन पैदा करती हैं।
  • PM 2.5, PM 10 और ब्राउन कार्बन: लकड़ी, कपूर और सिंथेटिक पदार्थों के जलने से निकलने वाली कालिमा और सूक्ष्म कण (Particulate Matter) फेफड़ों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं।

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