By: Ravindra Singh
Raksha Bandhan Katha : रक्षाबंधन को आमतौर पर भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जोड़कर देखा जाता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले इस पर्व पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी सुख-समृद्धि व लंबी आयु की कामना करती हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि पौराणिक मान्यताओं में रक्षासूत्र बांधने की एक ऐसी कथा भी मिलती है, जिसमें बहन ने नहीं बल्कि पत्नी ने अपने पति की कलाई पर रक्षा धागा बांधा था।

इस साल रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन राखी बांधने का शुभ समय सुबह 5 बजकर 57 मिनट से 10 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। रक्षाबंधन से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें इंद्र देव और उनकी पत्नी इंद्राणी की कथा का विशेष उल्लेख मिलता है।
भविष्य पुराण में मिलता है इस कथा का उल्लेख
Raksha Bandhan Katha रक्षासूत्र से जुड़ी इंद्र और इंद्राणी की कथा का वर्णन भविष्य पुराण में बताया गया है। इस कथा में रक्षाबंधन का स्वरूप आज की परंपरा से कुछ अलग दिखाई देता है। यहां रक्षा सूत्र भाई-बहन के बीच नहीं, बल्कि पत्नी द्वारा अपने पति की कलाई पर बांधा जाता है।

देवताओं और असुरों के बीच हुआ लंबा युद्ध
Raksha Bandhan Katha पौराणिक कथा के अनुसार किसी समय देवताओं और असुरों के बीच भयंकर संघर्ष शुरू हुआ। यह युद्ध लंबे समय तक चलता रहा और करीब 12 वर्षों तक जारी रहने की बात कही जाती है। युद्ध में असुरों का पलड़ा भारी होने लगा, जिससे देवताओं की चिंता बढ़ गई।

देवराज इंद्र सहित सभी देवता इस स्थिति से परेशान थे। इंद्र की पत्नी इंद्राणी भी अपने पति और देवताओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं। उन्होंने इस संकट से बाहर निकलने का उपाय जानने के लिए देवगुरु बृहस्पति से मार्गदर्शन मांगा।
इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर बांधा पवित्र धागा
Raksha Bandhan Katha कथा के अनुसार देवगुरु बृहस्पति ने इंद्राणी को एक पवित्र धागा तैयार करने की सलाह दी। उन्होंने उस धागे को मंत्रों से अभिमंत्रित कर इंद्र की कलाई पर बांधने के लिए कहा।
बृहस्पति की सलाह मानकर इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से तैयार किया गया पवित्र रक्षासूत्र अपने पति इंद्र की कलाई पर बांधा। उन्होंने इंद्र की विजय और सुरक्षा की कामना की।
मान्यता है कि इसके बाद युद्ध में देवताओं की स्थिति मजबूत हुई और देवराज इंद्र को विजय प्राप्त हुई। इसी घटना को रक्षासूत्र बांधने की प्राचीन परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
समय के साथ भाई-बहन के पर्व में बदला स्वरूप
Raksha Bandhan Katha इंद्र-इंद्राणी की कथा में रक्षासूत्र का उद्देश्य सुरक्षा और मंगलकामना से जुड़ा था। समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप बदलता गया और रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और सुरक्षा के प्रतीक पर्व के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
आज श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। भाई भी बहन की रक्षा और उसके सुखद भविष्य का संकल्प लेते हैं। इस तरह राखी केवल एक धागा नहीं बल्कि परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम, विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक मानी जाती है।
लक्ष्मी और राजा बलि से भी जुड़ी है राखी की कथा
Raksha Bandhan Katha रक्षाबंधन से संबंधित एक अन्य प्रसिद्ध पौराणिक कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। इस कथा को भी रक्षाबंधन की परंपरा से जोड़ा जाता है।
इस प्रकार रक्षाबंधन के पीछे एक नहीं बल्कि कई पौराणिक प्रसंग बताए जाते हैं। अलग-अलग कथाओं में राखी को सुरक्षा, प्रेम, विश्वास और मंगलकामना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
रक्षाबंधन का धार्मिक महत्व
Raksha Bandhan Katha रक्षाबंधन का मूल भाव किसी प्रिय व्यक्ति की सुरक्षा और उसके कल्याण की कामना करना है। पौराणिक कथाओं में रक्षासूत्र को संकट से रक्षा और शुभ फल की कामना से जोड़ा गया है। आधुनिक समय में यह त्योहार भाई-बहन के स्नेह को मजबूत करने के साथ परिवार में आपसी प्रेम और विश्वास का संदेश भी देता है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक कथाओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसे धार्मिक आस्था के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए।
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