Hartalika TeejHartalika Teej
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By: Ravindra Singh

Hartalika Teej : भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित प्रमुख व्रतों में से एक है। इस दिन महिलाएं सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं और विधि-विधान से शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। इस पूजा में कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बताया जाता है। इन्हीं में से एक है पूजा की चौकी के ऊपर फुलेरा लगाना।

फूलों, पत्तियों और विभिन्न प्राकृतिक वनस्पतियों से तैयार किया जाने वाला फुलेरा देखने में आकर्षक होता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे केवल पूजा स्थल की सजावट नहीं, बल्कि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह मंडप तथा प्राकृतिक वातावरण का प्रतीक माना जाता है।

क्या होता है फुलेरा?

Hartalika Teej फुलेरा फूलों और हरी पत्तियों से बनाया जाने वाला एक तरह का प्राकृतिक मंडप या छत्र होता है। हरतालिका तीज की पूजा के दौरान इसे मिट्टी या बालू से बनाए गए पार्थिव शिवलिंग के ऊपर लगाया जाता है।

मान्यता के अनुसार, यह मंडप भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की स्मृति से जुड़ा है। इसे उनके ऊपर बनी दिव्य छत्रछाया का प्रतीक भी माना जाता है। इसी वजह से तीज की पूजा में फुलेरा को विशेष स्थान दिया जाता है।

फुलेरे की फूलों की लड़ियों का क्या अर्थ है?

Hartalika Teej फुलेरे से नीचे की ओर लटकने वाली फूलों की लड़ियों को लेकर भी धार्मिक मान्यता प्रचलित है। इन्हें भगवान शिव की पांच पुत्रियों—जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली—का प्रतीक माना जाता है।

लोक मान्यताओं में कहा जाता है कि फुलेरे के नीचे बैठकर शिव-पार्वती की पूजा करने और उसके दर्शन करने से वैवाहिक जीवन की परेशानियां दूर हो सकती हैं। संतान सुख की कामना से भी इस परंपरा को जोड़कर देखा जाता है।

किन फूलों और वनस्पतियों से तैयार होता है फुलेरा?

Hartalika Teej फुलेरा बनाने में अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराओं के अनुसार कई तरह के प्राकृतिक फूलों और वनस्पतियों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें चिलबिनिया, नवकंचनी, सागौर, हनुमंत सिंदूरी, धतूरे के फूल, मदार, बिंजोरी, रांग पुष्प और मौसत पुष्प जैसी वनस्पतियां शामिल बताई जाती हैं।

इसे तैयार करने में काफी मेहनत लगती है और पारंपरिक तरीके से इसे बनाने में लगभग चार से पांच घंटे तक का समय लग सकता है। कुछ स्थानों पर इसकी लंबाई करीब सात फीट तक रखी जाती है।

पत्तियों से भी जुड़ी है खास मान्यता

Hartalika Teej फुलेरा को केवल फूलों से ही नहीं सजाया जाता, बल्कि इसमें कई प्रकार की पत्तियों और बेलों का भी इस्तेमाल किया जाता है। नवबेलपत्र, लज्जावती यानी छुईमुई, शिल भिटई, शिवताई, हिमरितुली, चरबेर, झानरपत्ती, त्तिलपत्ती और विभिन्न प्रकार की शमी पत्तियों का प्रयोग किए जाने की परंपरा कुछ क्षेत्रों में मिलती है।

इन प्राकृतिक सामग्रियों को माता पार्वती की वन साधना और प्रकृति से उनके जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।

माता पार्वती की तपस्या से कैसे जुड़ा फुलेरा?

Hartalika Teej हरतालिका तीज से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। मान्यता है कि वन में तपस्या के दौरान उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की थी।

प्राकृतिक फूलों और पत्तियों से पूजा करने की इसी परंपरा को फुलेरे से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए फुलेरा माता पार्वती की तपस्या, उनकी भक्ति और प्रकृति के बीच उनके साधना-जीवन की याद दिलाने वाला प्रतीक माना जाता है।

फुलेरा क्यों माना जाता है शुभ?

Hartalika Teej हरतालिका तीज की पूजा में फुलेरे का महत्व मुख्य रूप से धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपराओं पर आधारित है। इसे शिव-पार्वती के प्रेम, विवाह, तपस्या और प्रकृति के साथ उनके संबंध का प्रतीक माना जाता है।

कई स्थानों पर आज भी महिलाएं पारंपरिक तरीके से फूल-पत्तियों से फुलेरा तैयार करती हैं और उसे पूजा की चौकी के ऊपर स्थापित करके शिव-पार्वती की आराधना करती हैं। इस तरह यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोक संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान को भी दर्शाती है।

धार्मिक मान्यता से जुड़ी जरूरी बात

Hartalika Teej फुलेरे से संबंधित दांपत्य सुख, संतान प्राप्ति या अन्य फल मिलने की बातें धार्मिक और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनके समर्थन में कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

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