By: Yogendra Singh
Rohtas : डेहरी-ऑन-सोन क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन पत्थर का पुल अपनी अनोखी विशेषता के कारण लोगों को चकित कर देता है। यह पुल बरसात के दिनों में पूरी तरह पानी में डूब जाता है और जैसे ही जलस्तर घटता है, फिर से दिखाई देने लगता है। इसी वजह से स्थानीय लोग इसे “अदृश्य पुल” के नाम से जानते हैं। यह सिर्फ एक ढांचा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी इंजीनियरिंग कला और ऐतिहासिक धरोहर का अद्भुत उदाहरण है।

500 साल पुरानी ऐतिहासिक कड़ी
Rohtas इतिहासकारों के अनुसार, यह पुल लगभग 16वीं शताब्दी में बनाया गया था। माना जाता है कि इसका निर्माण अफगान शासक शेरशाह सूरी के शासनकाल (1540–1545) के दौरान हुआ। शेरशाह सूरी को प्रशासनिक सुधारों और सड़कों के विकास के लिए जाना जाता है। उनके समय में ऐतिहासिक Grand Trunk Road का विस्तार हुआ, जो उत्तर भारत को पूर्व और पश्चिम से जोड़ता था।
यह पत्थर का पुल सोन नदी के बीचों-बीच बनाया गया था और रोहतास व औरंगाबाद क्षेत्र को जोड़ने का काम करता था। करीब साढ़े तीन किलोमीटर लंबा और लगभग 17 फीट चौड़ा यह पुल बड़े-बड़े पत्थर के स्लीपर से निर्मित है। इसकी बनावट उस दौर की उन्नत तकनीक और दूरदृष्टि को दर्शाती है।
बरसात में क्यों हो जाता है गायब?
Rohtas इस पुल की सबसे खास बात यह है कि मानसून के दौरान सोन नदी का जलस्तर बढ़ते ही पूरा ढांचा पानी में समा जाता है। ऊपर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो यहां कभी कोई पुल था ही नहीं। लेकिन जैसे ही पानी कम होता है, पत्थरों की लंबी कतार फिर से उभर आती है।

पुल के प्रत्येक पत्थर की लंबाई लगभग 9 से 10 फीट बताई जाती है। सदियों पुराना होने के बावजूद ये पत्थर आज भी काफी मजबूत दिखाई देते हैं। यह उस समय की शिल्पकला और इंजीनियरिंग दक्षता का प्रमाण है।
संरक्षण की दरकार
Rohtas समय के साथ सोन नदी पर आधुनिक पुलों का निर्माण हो चुका है, जिससे इस ऐतिहासिक पुल का उपयोग लगभग समाप्त हो गया है। अब यह केवल अतीत की एक मौन गवाही बनकर रह गया है।

चिंता की बात यह है कि उचित संरक्षण के अभाव में यह धरोहर धीरे-धीरे क्षरण का शिकार हो रही है। यदि समय रहते पुरातत्व विभाग और स्थानीय प्रशासन द्वारा ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इस “अदृश्य पुल” को केवल इतिहास की किताबों में ही पढ़ पाएंगी।
यह पुल केवल पत्थरों का समूह नहीं, बल्कि भारत की मध्यकालीन स्थापत्य कला, प्रशासनिक दूरदर्शिता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। जरूरत है कि इसे संरक्षित कर पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिया जाए, ताकि 500 साल पुरानी यह कहानी आने वाले समय में भी जीवित रह सके।
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